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मूल प्रजातियों का बचाव

(Save Our Native Species)

आज हम एक ऐसे विषय पर विचार करेगें जो बहुत ही गहन और जरूरी है- हमारे मूल पेङ-पौधों की प्रजातियाँ

मूल पेङ-पौधे वे हैं जो स्वाभाविक/प्राकृतिक रूप से किसी विशेष क्षेत्र में बिना मानव परिचय व पारिस्थितिक तंत्र के विकसित हुए थे। परंतु आज आप कुछ क्षण रूककर अपने चारों ओर निगाह करे, देखें और बताएं कि कितने ही ऐसे पेङ बचे है जिनके साथ आपका बचपन बीता था। जिन पल हर सावन मे झूले डाले जाते थे। कहां चले गए इन पेङों पर दिन भर चहकने वाले पक्षी, कौवे, मोर, तीतर यहां तक कि घरेलू चिङियां जो झुंड मे हमारे आंगनों मे आकर दाने चुगती थी। अब गिने चुने कभी दिख जाए तो दिख जाए। पहले गावों में खूब सारे नीम, पीलू, कीकर, बेरी, लेहसुए, शहतूत, कैर/ करीर,सिरीस, बेलपत्र, आदि पेङ पौधे होते थे। हम सभी बच्चे पील की झोली भलकर घर लाया करते थे अब तो जैसे वो पेङ शायद ही कही दिखाई दे। हर खेत में खेजरी/जाटी/शमी खूब मिलती थी जिसकी छांव मे पूरा परिवार लावणी (कटाई)के बाद आराम किया करता था। आपने सोचा है कहां गए सब ???? 

खेजरी /जाटी
प्रमुख आक्रामक प्रजातियां (हरियाणा)
प्रजातिअनुमानित सीमा
लैंटाना कैमरा (Lantana camara)78
बिलायती बबूल (Prosopis juliflora)54
कांस (Saccharum spontanem)54
गन्धे झार/Floss flower (Ageatum houstonianum)26
सुबबूल (Leucanea Leucocephala)14

Source- State forest Indian report 2019

मूल पेङ-पौधों की आवश्यक्ता

  • जल संरक्षण– देशी पौधे स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल होते है, इसलिए उन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, जिससे समय, पैसा और सबसे मूल्यवान प्राकृतिक संसाधन, पानी की बचत होती है। जिन क्षेत्रों मे पानी की कमी है वहा देशी प्रजातियां ही कारगर है। 
  • मूल पौधे मूल पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण निवास स्थान भी प्रदान करते है। मूल पेङों के होने के कारण लुप्त हो रही मूल पक्षी प्रजातियों में भी बढोतरी होती है।
  • वन्य जीवन– पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण निवास स्थान प्रदान करने के अलावा, वन्यजीवों की कई अन्य प्रजातियों को भी  देशी पौधो से लाभ मिलता है। ये परागणकों, देशी मधुमक्खियों, तितलियों, पतंगों और चमगादड़ों सहित को पराग/ रस प्रदान करते हैं। वे कई स्तनधारियों के लिए सुरक्षात्मक आश्ररय भी प्रदान करते हैं। इन पौधों द्वारा उत्पादित देशी बीज और फल सभी प्रकार के वन्यजीवों के लिए आवश्यक खाद्य पदार्थ होते हैं। सभी विशिष्ट प्रजातियां देशी पौधों की प्रजातियों पर निर्भर हैं। 
  • कम रखरखाव– आमतौर पर मूल-पौधों को एक बार स्थापित कर देने के बाद, कम रखरखाव की आवश्यकता होती है।
  • वैज्ञानिक और औषधिय उपयोग–  देशी प्रजातियों के फूल, फल, बीज, छाल, कोपले, गोंद, जङे आदि सभी उपयोगी होते है। 
    • नीम(Azadirachta indica)
    • बबूल(Acacia nilotica)
    • मुलेठी(Glycyrrhiza glabra)
    • एलोय(Aloe vera)
    • शतावारी(Asparagus racemosus)
    • बेल(Aegle marmelos)
    • गिलोय(Tinospora cordifolia) आदि।
  • जलवायु में सहायक- जब जलवायु परिवर्तन की बात आती है, तो ये मनुष्य के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी होते हैं। देशी पौधों के साथ भूनिर्माण करना, जलवायु परिवर्तन के लिए एक अच्छा उपाय है।
  • कार्बन प्रदूषण को कम करने मे लाभदायक होते है। कई देशी पौधे; विशेष रूप से लंबे समय तक जीवित रहने वाले पेड़, ग्रीनहाउस गैस ‘कार्बन डाइऑक्साइड’ के भंडारण में प्रभावी हैं।
  • कार्बन पृथक्करण – मूल पौधे पर्यावरण में बहुत ज्यादा मात्रा में कार्बन को अवशोषित कर लेते है। ये 22 टन के लगभग CO2 तने शाखाओ और जङो मे एकत्रित कर लेते है। ये हमारे लिए विशाल कार्बन डाइऑक्साइड सिंक है।  हालांकि एक तर्क यह भी है कि विदेशी प्रजातियां भी कार्बन अवशोषित करती है परंतु जैव-विविधता, जल, भूमि अवक्रमण ,पारिस्थितिकी तंत्र पर इनके नाकारात्मक प्रभाव को नजरअंदाज नही किया जा सकता है। मूल पौधे साथी पौधों की वृद्धि और उत्पादकता को बढ़ाते है। लेकिन विलायती कीकर व लैंटाना आदि दूसरे पौधो को पनपने नही देते और दूसरे जानवरों की आवाजाही भी रूक जाती है।
  • सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण– मूल प्रजाती के विषय में पारंपरिक ज्ञान होने से, स्थानीय रूप से समाज और अर्थव्यवस्था में भी समुन्नति होती है। जैसे टिंबर तथा लघु वन-उपज से बहुत युवाओं को रोजगार मिल सकता है। रोहिङा व पलास के फूलों से देशी गुलाल बनाया जाता है। देशी पौधे औषधी के रूप मे प्रयोग मे लाये जाते है। आजकल NCU (Neem Coated Urea) किफायती व मूल्यवर्धक योजना है जिसमे साधारण यूरिया पर नीम के बीज के तेल की परत होती है। जिससे मिट्टी की उर्वरक शक्ति व नाइट्रोजन उपलब्धता मे बढ़ोतरी होती है और फसल प्रचुर मात्रा मे मिलती है। स्थानीय घास से शिल्पकारी की जाती है जैसे रस्सी, टोकरी आदि बनाना।
  • भव्य सुंदरता- बहुत सारे गुणों के अलावा देशी-पौधे सुंदर फूल प्रदान करते हैं, प्रचुर मात्रा में रंग-बिरंगे फल और बीज का उत्पादन भी करते हैं। शानदार मौसमी परिवर्तन फिके पीले से लेकर, प्रारंभिक वसंत ऋतु के हरे रंग तक और फिर पतझङ के पीले व लाल रंग में। जैसे अमलतास, रोहिङा (रेगिस्तान का रक्षक), ढ़ाक/पालास का पेङ (flame of the forest)आदि।
  • अच्छा वातावरण- भूनिर्माण के लिए देशी पौधों का चयन करके, आप न केवल वन्यजीवों की मदद कर रहे हैं, बल्कि आप अपने व अपने परिवार और समुदाय के लिए एक स्वस्थ स्थान बना रहे होते हैं। जो प्रकृति ने खुद बनाया है उसके बारे में मेरे पास शब्द कम है। “आओ पेङ लगाए हम, जीवन सुखी बनाएं हम“।

करीर/ कैर/टींट (Capparis decidua)

यह एक बहुत ही पौराणिक व लाभदायक पौधा है। करीर का पौधा शुष्क परिस्थितियों के अनुकूल होता है और कठोर जलवायु में भी विकसित हो सकता है। अरण्यकपर्व या वन पर्व/ महाभारत/किताब III/ पृष्ठ संख्या 174 में- पांडव बारहवें वर्ष अपने जंगल में यात्रा करते हुए सरस्वती नदी तक पहुंचे थे : निम्नलिखित श्लोक में महत्वपूर्ण पेङों का उल्लेख किया गया है। 

पलक्षाक्ष रौहीतक वेतसाश च;

सनुहा बथर्यः खथिराःशिरीषाः

बिल्वेङ्गुथाः पीलु शमीकरीराः

सरस्वती तीररुहा बभूवुः

सदियों से पेङ पौधों की पूजा करना हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। जैसे पीपल,बरगद, बेलपत्र, कैर, जाटी इत्यादि। मुझे याद है कि हमारे गांव में ज्येष्ठ माह में औरते, बच्चे, बङी बुढ़ी सभी मिलकर , हाथ मे दलिया कटोरी और जल लेकर कैर पूजने जाया करते थे। सब औरते रास्ते भर निराले गीत गाती और हम सभी बच्चे नाचते हुए मौज मस्ती करते हुए आनन्द लेते। बहुत सारे कैर के पौधे सङको के पास, रास्तो में, खेतो की मेङ पर हुआ करते थे। बहुत अच्छा लगता है सोचकर कि हमारी संस्कृति हमे सभी का आदर करना सीखाती है। हमारे यहां यह रिवाज अभी भी है पर अब चीजे बदल चुकी है। अब कही ही बहुत ढ़ूढने से इका दुका कैर मिलेगा। बहुत दुखद है कि हम अपने देशी प्रजातियों को खो रहे है।

यह अर्ध-रेगिस्तानी और रेगिस्तानी इलाको मे वनीकरण, पुनर्वनरोपण हेतू बहुत उपयोगी है। मिट्टी के कटाव को रोकता है। दवाई व औषधी मे प्रयोग किया जाता है। इसके कई शारिरीक स्वास्थ्य लाभ है जैसे इसका सेवन शुगर के मरीज के लिए अच्छा माना जाता है। यह विटामिन ए, बी, सी से भरपूर है और पाचन क्रिया मे लाभदायक है। कैर का उपयोग सब्जी, अचार आदि बनाने के लिए भी किया जाता है।

खेजङी/शमी/जाटी/सांगर (Prosopis Cineraria)

खेजरी शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्रों मे पाई जाने वाली विशिष्ट मूल प्रजाती है। यह सदाबहार कांटेदार, छायादार पेड़ है जो शुष्क परिस्थितियों के अनुकूल होता है। जाटी बहुत कठोर जलवायु व गर्म हवाओं का सामना कर शुष्क इलाकों मे अच्छी तरह से विकसित होने वाला पेङ है। इसमें जड़ प्रणाली गहरी व अच्छी तरह विकसित होने वाली होती है और इसमें पानी और नाइट्रोजन की आवश्यकताएं भी कम होती हैं। इसकी व्यापक जड़ प्रणाली के कारण, यह रेत के टीलों को स्थानांतरित करने और हवा का रुख बदलने के रूप में भी उपयोगी है। यह वृक्ष साथी पौधों की वृद्धि और उत्पादकता को बढ़ाता है। यह फसलों के साथ नमी और पोषक तत्वों के लिए प्रतिस्पर्धा भी नहीं करता। कुछेक बैक्टीरिया के साथ एक सहजीवी संबंध स्थापित करके मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा को बनाए रखता है जिससे मिट्टी की उर्वरता में सुधार होता है। इन सभी के कारण, खेजड़ी कृषि फसलों के अनुकूल है। खेतों में काम करने वाले किसानों के साथ-साथ गर्मियों के महीनों के दौरान मवेशियों और वन्यजीवों को बहुत आवश्यक छाया और आश्रय प्रदान करता है। रेगिस्तान में पशुधन के लिए इसकी पत्तियां पौष्टिक आहार हैं। शुष्क और अर्ध शुष्क क्षेत्रों के वनीकरण में इसके महत्व के कारण, यह कृषि क्षेत्रों, चारागाहों और ग्राम समुदाय भूमि आदि सभी के लिए रामबाण से कम नही है। पेड़ का गोंद एम्बर रंग का, व बबूल के गोंद के समान गुणों वाला होता है। पहले लोग अकाल के समय, इस पेड़ की छाल खाते थे। इसकी छाल तेज स्वाद के साथ सूखी, तीखी, कड़वी होती है और इसका उपयोग औषधि के लिए किया जाता है।  खेजड़ी की फली/सांगरी को सूखे और हरे रंग, में सब्जी व अचार के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। हमारे घर मे दादी मां सांगरी व आलू की सब्जी बनाते थे। इसके बीजों से देशी साग (खाटे की सब्जी) बनती थी जो बहुत स्वादिष्ट व पौष्टिक होती थी।

खाटे की सब्जी

खेजड़ी के पेड़ की महानता इस उल्लेख तक सीमित नहीं है। 1731 में, अमृता देवी ने 363 अन्य लोगों के साथ खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया। यह राजस्थान का राज्य वृक्ष है। खेजरी को सौभाग्य का प्रतीक मानते हैं। हमारे यहां हरियाणा में भी हर जनमाष्टमी पर जाटी का पूजन किया जाता है और यह त्यौहार धूमधाम से मनाया जाता है।

जनमाष्टमी पर जाटी पूजन

हमारे महाकाव्यों महाभारत और रामायण में भी इस पेड़ के बारे में बताया गया है। 

शमी शमयते पापम् शमी शत्रुविनाशिनी।

अर्जुनस्य धनुर्धारी रामस्य प्रियदर्शिनी॥

करिष्यमाणयात्राया यथाकालम् सुखम् मया।

तत्रनिर्विघ्नकर्त्रीत्वं भव श्रीरामपूजिता॥

अर्थ– शमी वृक्ष पापों को दूर करता है। इसके कांटे लाल रंग के होते हैं। यह भगवान राम का पसंदीदा पेड़ है और इसी में पांडवों ने अपने शस्त्र छिपाए थे। हे शमी, भगवान राम ने आपकी पूजा की है। मैं अब जीत की यात्रा पर निकल पड़ा हूं आप इसे सुखद और बाधाओं से मुक्त करे।

  • खेजरी विभिन्न बीमारियों का एक लोक उपचार है। 
  • यह सूजन या जलन से राहत देता है।
  • इसकी छाल, जिसे कृमिनाशक, टॉनिक कहा जाता है, अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, पेचिश, त्वचा विकार, कुष्ठ रोग, बवासीर आदि के उपचार के लिए लाभदायक है।
  • इसकी फली प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्त्रोत है।
  • इसके बीजो से दवाई बनती है। लेकिन पेड़ का मूल्य इसके औषधीय गुणों से कहीं अधिक है।

इस धरती पर असंख्य प्रजातियाँ हैं, सब प्रकृति का संतुलन बनाने के लिए हर समय नियमित रूप से अपना-अपना काम कर रहे है। जिनके कारण कही न कही मानव को भोजन, आवास, व अन्य आवश्यक संसाधन उपलब्ध है। हर एक प्रजाति की सृष्टि में खास भूमिका होती हैं। प्राकृतिक परिवेश में अगर एक भी जीव अस्तित्व से गायब होता है, तो इसका विपरीत असर पूरे पारितन्त्र पर पड़ता है। ‘जैव-विविधता का संरक्षण’ भारतीय संस्कृति की तह तक समाया हुआ है। हमारी मूल पेङ पौधो की प्रजातियां, वे पारिस्थितिक आधार हैं जिन पर जीवन निर्भर करता है, जिसमें पक्षी और लोग भी शामिल हैं। उनके बिना और कीड़े (जो उनके साथ विकसित हुए), स्थानीय पक्षी, जीवित नहीं रह सकते। आखिर सारे देशी पेड़ प्रजातियां कहाँ चले गए, क्या कारण है जो आज ये परिस्थिति आ गई है ??

विलुप्ता के कारण/चुनौतिया

1. वैश्विक तापमान- 

यह पृथ्वी पर जीवन हेतु बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है। यह ग्रीनहाउस प्रभाव द्वारा निर्मित पृथ्वी के वायुमंडलीय और महासागरीय तापमान में वृद्धि है। 1 डिग्री तापमान में वृद्धि भी पौधे और पशु जीवन को प्रभावित कर सकती है।

2. विदेशी प्रजातियां

यह तेजी से बढ़ती वैश्विक दुनिया में, तेजी से बढ़ती हुई समस्या हैं, बढ़ते व्यापार और यात्रा के साथ, नए वातावरण में प्रजातियों की शुरूआत अब ऐतिहासिक रूप से अभूतपूर्व है। विदेशी प्रजातियां चाहे जीव हो या पौधे, जब उन्हें पारिस्थितिक तंत्र से परिचित कराया जाता है तो वे स्थानीय पौधों और जानवरों को गंभीर नुकसान पहुंचाने लगते हैं, और संभावित रूप से उनके विलुप्त होने का कारण बनते हैं।

लैंटाना (Lantana camara)

एक मध्य और दक्षिण अमेरिका झाड़ी जो 1809 में एक बगीचे सजावटी के रूप में भारत में पेश की गई थी, पर यह बड़े पैमाने पर फैल गई है। पहली बार अमेरिका से बाहर फैल गया जब यह डच खोजकर्ताओं द्वारा यूरोप में लाया गया और व्यापक रूप से इसकी खेती की गई। जल्द ही आगे एशिया और ओशिनिया में फैल गया जहां इसने खुद को एक आक्रामक खरपतवार के रूप में स्थापित किया। यह मध्य और दक्षिण अमेरिका से लेकर लगभग 50 देशों में एक आक्रामक कुख्यात प्रजाति बन गई है। 

लैंटाना कैमारा डंठल का उपयोग फर्नीचर के निर्माण में किया गया है, जैसे कि कुर्सियां और टेबल, हालांकि मुख्य उपयोग ऐतिहासिक रूप से औषधीय और सजावटी हैं। परंतु बाकी प्रभावो को नजरंदाज नही किया जा सकता है। इसके कारण विविधता में कमी पायी गयी है, अगर यह कृषि क्षेत्रों पर हमला करता है तो यह भारी समस्या पैदा कर सकता है यह खेती की उत्पादकता को भी कम कर सकता है। इसका रोकथाम बहुत कठिन है यह तेजी से फैलती है।

परंतु रोकथाम के कुछ निम्नलिखित उपाय है

  • जैविक उपाय-कुछ कीटों और अन्य बायोकोन्ट्रोल एजेंटों से इसे नियंत्रित करने का प्रयास किया गया है पर ज्यादा सफलता नही मिल पायी है।
  • कैमारा का यांत्रिक नियंत्ररण- इसमें शारीरिक रूप से पौधों को निकालना शामिल है। लेकिन अत्याधिक समय लगता है और श्रम-गहन भी महंगा है। यांत्रिक नियंत्रण का एक अन्य तरीका अग्नि उपचार का उपयोग करना है।
  • रासायनिकउपचार- कैमारा का प्रबंधन करने के लिए हर्बिसाइड्स का उपयोग करना बहुत प्रभावी है, लेकिन यह महंगा है। रासायनिक रूप से उपचार करना सबसे प्रभावी तरीका है  परंतु इसके गंभीर पर्यावरणीय परिणाम हो सकते हैं। पर अच्छा यही होगा कि हम खूब सारे मूल पौधे लगाए ताकि खुद ही इनकी संख्या कम हो जाए।

प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (Prosopis Juliflora)

देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे विलायती कीकर, गांडो बावर और अल्टाइ क्रुवेल के रूप में जाना जाता है। दक्षिण अमेरिका से इस कांटेदार पेड़ को 1870 के आसपास भारत में अत्यधिक सूखा पङने के कारण, ईंधन के स्रोत के रूप में तथा गरीब लोगों की आर्थिक आवश्यकता की आपूर्ति हेतु लाया गया था, लेकिन यह पर्यावरण में गंभीर समस्या का कारण बनते चले गया। इसने अब भारत के (राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक) अर्ध-शुष्क राज्यों में अपना प्रभाव स्थापित कर लिया है। लोगों को आजीविका के कृषि क्षेत्र के अलावा अन्य अवसरों की तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह प्रजाति पारिस्थितिकी तंत्र पर गहरा प्रभाव डालती है। अपने कांटों और कई निम्न शाखाओं से अभेद्य घने रूप बनाता है  जिससे मवेशियों की आवागमन में रूकावटें पैदा होती है तथा पानी के स्रोतो तक पहुंचने से भी रोकता है। यह चारागाह घास के मैदानों पर भी कब्जा कर लेता है, दुर्लभ जल का उपयोग करता है व मैदानों के नुकसान के कारण भूमि क्षरण का कारण बनता है जो देशी पौधों और जानवरों के लिए आवास होते हैं। इसके बीज में न्यूरोडॉक्सिक अल्कलॉइड्स का अधिक मात्रा में सेवन, पशुधन के लिए जहर समान है। यह जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास को भी प्रभावित करता है। वे मूल प्रजातियों को दबाकर या खत्म करके आजीविका को प्रभावित करते हैं खासकर जो लोग आमतौर पर (NTFP- Non Timber Forest Produce) वन उत्पादों पर निर्भर करते हैं। अप्रत्यक्ष रूप से भी कृषि भूमि क्षरण करके नुकसान पहुंचाते है। आज हर जगह 80% से ज्यादा आपको यही देखने को मिलेगी. 

नियंत्रण‌‌

जैसे की ऊपर में कुछ उपाय बताये हैं रासायनिक इत्यादि जो विदेशी प्रजातियों को हटाने के अलावा कुछ नुकसान भी करते हैं। तो इनके नियंत्रण हेतु एक साधारण और अहिंसात्मक तरीका हैं कि-

  • हमें जितनी हो सके मूल छायादार प्रजातियां लगानी चाहिए। जहाँ यदि 5 विदेशी कीकर हैं वहाँ 25 पीपल बड़ लगाने हैं। क्योंकि ये बहुत जल्दी बड़े होते हैं और छायादार पेड़ बनते हैं जिससे सूर्य की किरणों को नीचे पहुँचने नही दिया जाता और विदेशी प्रजातियों की प्रगति धीरे हो जाती हैं और खातमा हो जाता हैं।
  • आप इन किकरो को जड़ से भी उखाड़ सकते है और बाड़ बना सकते हैं, किसी और काम मे प्रयोग कर सकते हैं। जड़ से उखाड़ने मे श्रृम अधिक लगता हैं और समय भी।

हमें विदेशी प्रजातियों को नकारत्मक रूप से देखने की जरूरत नही है क्योंकि प्रकृति ने ही उसको बनाया है फिर चाहे वो घास हो पेड़ हो झाडी हो खरपतवार हो जहरीला हो अच्छा हो खुशबुदार हो,गंध मारने वाला हो काटों वाला हो या बिना काटों वाला। हरेक का अपना अलग अलग महत्व है। पहले जहा बंजर जमीन थी वहां आज हरियाली है इनकी विलायती कीकर की वजह से। परन्तु समय के साथ साथ हमें अपनी मूल प्रजातियों का रख रखाव करना चाहिए था ताकि विलायती कीकरो का प्रसार अधिक नही हो। जितना ज्यादा हो सके ऐसी जगहो मे FICUS प्रजातियों के पेड़ लगाने चाहिए। जैसे पीपल बड़ पिलखन गुलर नीम आदि । क्योंकि ये बहुत जल्दी बढ़ते हैं और वातावरण मे इनका बहुत ही महत्वपूर्ण योगदान हमेशा से रहा है।

3. मानव निर्मित कारक

  • प्रकृति मे स्वयं को सबसे बड़ा समझने की भूल और बाकी सभी जैव विविधताओं को एकदम नजरंदाज कर देना।
  • अत्यधिक शोषण– प्रकृति के सभी संसाधनों का   दुरूपयोग करते जाने की आदत। अपनी भूल को सुधारने की बजाय और ज्यादा शोषण करते रहना।
  • प्राकृतिक वास का नुकसान वनों की कटाई और शहरीकरण इन दो कारणों से पौधे और जानवर दोनों विलुप्त हो रहे हैं। जिस आवास में जो प्रजाति मिलती है यदि वह आवास नष्ट हो जाए तो वो प्रजातियां भी हमेशा के लिए  खत्म हो जाती है।
  • वनों की कटाई मनुष्य अपने निजी स्वार्थ के लिए जंगलों को समतल करते रहे है या इमारत या कृषि के लिए जगह बनाते रहे है। जिससे पूरे पारिस्थितिक तंत्र को बहुत नुक्सान पहुँचा हैं।
  • शहरीकरण –एक बार फ़िर ग्रामीण क्षेत्रों को शहरों में बदलना है। जैसे-जैसे मानव आबादी बढ़ती है, अधिक से अधिक भूमि को खाली करना पड़ता है और रहने की जगह के लिए शहरीकरण करना पड़ता है। यह जानवरों और पौधों के आवास को सिकोड़ता है। हज़ारो लाखों जीव जानवरों और पेड़ पौधों को कुर्बानी देनी पड़ती है।
  1. विश्व वन्यजीव कोष के अनुसार, प्रत्येक वर्ष 36 मिलियन एकड़ प्राकृतिक वन को समतल किया जाता है।
  2. दुनिया की 80 प्रतिशत प्रजातियों के लिए जंगल निवास स्थान प्रदान करता है। पर हमें शायद ही फर्क पड़ता हैं कि हम कुछ गलत भी किये हैं या कर रहे है क्यों ? हमारे घर में प्लॉट में यदि पेड़ पोधे हैं तो हम चंद समय नही लगाते,उसका कोड़ी का मोल लगाके, कटवाने मे, क्यों?

पेड़ किसी की निजी वस्तु नही हैं जिसका जब मन किया काट दिया। एक पेड़ का कटना आसपास के वातावरण मे बहुत बड़ा परिवर्तन लाता हैं जिसकी भरपाई होना मुश्किल है।

कृषि क्षेत्र पर प्रभाव-

पारम्परिक तरीके से होने वाली खेती की जगह औद्योगिक तरीके की खेती का प्रचलन बढा है। इसी के चलते हानिकारक कीटनाशक व रासायनिक उर्वरकों आदि का प्रयोग धड़ल्ले से होने लगा है और जैव विविधता संकट में आ गई हैं। ये उर्वरक हमारे भोजन मे जाकर कैंसर जैसी बिमारियों का कारण बनते हैं। मिट्टी की उपजाऊ शक्ति मे भी कमी आ जाती है। कृषि में उपयोग होने से ये रासायनिक पदार्थ भूमि मे नीचे चले जाते है और भूमि जलसायों में घुलकर साफ जल को भी दूषित करते हैं। इसी तरह पर्यावरण का भारी नुकसान हो रहा है।  बड़े खुले खेतों को बनाने के लिए जंगलों को नष्ट कर दिया जाता है, और इससे मिट्टी का क्षरण होता है। यह जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवास को भी प्रभावित करता है।

4) दुर्भाग्य से, नर्सरी में उपलब्ध अधिकांश भूनिर्माण पौधे विदेशी प्रजातियां हैं। ये विदेशी पौधे खाद्य वेब को विचलित करते हैं, और इससे कई इनवेसिव कीट बन गए हैं।
5) जागरुकता की कमी के कारण देशी प्रजातियां पनप नही रही है। हर जगह विदेशी प्रजातियों का प्रसार हो रहा हैं।

हरियाणा मे एक गीत है-“पहल्या आली हवा रही ना, पहल्या आला पानी, होगी खत्म कहानी, ना मिलती कोई भी चीज पुराणी।” जैव-विविधता का संरक्षण भारतीय संस्कृति में तह तक समाया हुआ है। हम सदियों से पेङ पौधो जीवों को पूजते आए है। ये सभी पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं जिन पर हमारा जीवन भी निर्भर करता है। इन सभी की वजह से ही मानवता को भोजन, आवास व अन्य आवश्यक संसाधन मिलते है। इस प्राकृतिक परिवेश में एक भी जीव अगर लुप्त होता है, तो इसका विपरीत असर पूरे पारितन्त्र पर पड़ता है। यहाँ हर प्रजाति, हर छोटे बङे जीव की खास भूमिका है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह कि आखिर इतना जानते-समझते हुए भी हम प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन क्यों करते है? 

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 पर्यावरण को परिभाषित करता है “पर्यावरण में जल, वायु और भूमि में अंतर्संबंध शामिल हैं जो वायु, जल और भूमि और मानव प्राणियों, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्म जीव और संपत्ति के बीच मौजूद हैं”।

अनुच्छेद 51-ए (जी), “यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वे जंगलों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करें और जीवित प्राणियों के लिए दया करें।”

मेरी सोच यह है कि

  • हम मूल पौधे लगाए ताकि खुद ही विदेशी प्रजातियों की संख्या कम हो जाए।
  • पुनर्विकास के लिए in-situ conservation की आवश्यकता है।
  • कुछ तकनीकी साधनो से अच्छी नर्सरी, अच्छी जेनेटिक बीज का निर्माण करना और लोगो मे जागरुकता लाना।
  • स्कूल के बच्चो के साथ निम्न निम्न कार्यकर्म करना, उनको पर्यावरण संबधित गतिविधियों मे शामिल करना।
  • सबको शामिल करके एक नया साफ सुंदर पर्यावरण बनाना। 

 देशी पेड़ पौधे लाखों वर्षों के विकास का परिणाम हैं। उन्हें संरक्षण में सर्वाधिक महत्व मिलना चाहिए। आइए हम सब एक साथ जुडकर अपने मूल पौधों के लिए खड़े हों, उनकी रक्षा करे। http://chng.it/w9YZpnHV

~रुपक

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