Categories
Environment

विश्व पर्यावरण दिवस- ” जैव विविधता “

‘विश्व पर्यावरण दिवस’ प्रकृति और हमारा घर ‘पृथ्वी’ की रक्षा के लिए, सकारात्मक पर्यावरणीय कार्रवाई करने के लिए, वैश्विक जागरूकता बढ़ाने के लिए, हर साल 5 जून को मनाया जाता है।
पर्यावरण संरक्षण पर बड़ी-बड़ी बातें करने की जगह, हमें कुछ छोटी-छोटी मगर जरूरी चीजों का खयाल रखना पड़ेगा। तभी हमारा जीवन साकार है।

प्रकृति ने मनुष्य को रहने,फलने फूलने का मौका दिया है बिल्कुल उसी तरह बाकी सभी जीव भी स्वतंत्र रूप से इस पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा है। हर जीव दिन रात इसको बनाने मे काम कर रहा है। हमने हमेशा खुद को सर्वोपरी मानकर प्रकृति को और उससे जुङे हर जीव को पेङ पौधो को बहुत नुकसान पहुचायां है। हर दिन कोई न कोई घटना हो रही है जिससे प्रकृति तंत्र को बहुत नुकसान पहुंचता है। हाल ही मे केरल मे हुई दुर्घटना शर्मनाक है। हमारी मनुष्यता पर एक ओर कलंक लग गया। एक वन अधिकारी के अनुसार हथिनी खाने की तलाश मे जंगल से निकलकर पास के गांव मे निकली और वह भूखी होने के बावजूद शांत थी। वहां के कुछ लोगो ने उसे एक अनानास दिया जिसमे बहुत सारे पटाखे भरे हुए थे। उसने सब पर भरोसा किया। जैसे ही उसने खाया उसके मुहं मे भयानक विस्फोट हुए जिसकी वजह से उसके अंदरूनी हिस्सो को भारी नुकसान हुआ। असहनीय दर्द से कहराती हुई वो बेजुबान प्राणी नदी की ओर भागी। और इतनी पीङा होते हुए भी रास्ते भर में उसने किसी को नुकसान नही पहुचायां। इतनी शांत जीव थी वो। दर्द कम करने के लिए शायद नदी के बीच पानी मे मुहं डालकर खङी रही। वन अधिकारियों ने बाहर निकालकर इलाज करना चाहा पर अब शायद उसका भरोसा हर इंसान से उठ चुका था। अपने दर्द के साथ उसने वही पर अंतिम सांसे ली। पोस्टमाॅर्टम हुआ तो पशु चिकित्सक आंखो मे आंसू थे। उन्होनें बताया कि वह अकेली नही थी। उसके अंदर एक नन्ही जान पल रही थी। यहां पर एक नही 4 जाने गई- एक हथिनी की, एक उसके गर्भ मे पल रहे बच्चे की, एक इंसानियत की और एक उस भरोसे की जो जानवर हम इंसानो पर करते है।

  • Are we real human being?

प्रकृति रक्षति: रक्षित:
अर्थ- हम प्रकृति की रक्षा करेंगे, तो प्रकृति हमारी रक्षा करेगी। प्रकृति से सुरक्षा पाते रहने के लिए उसका संरक्षण करना जरूरी है

जैव-विविधता का संरक्षण भारतीय संस्कृति में तह तक समाया हुआ है। हम सदियों से पेङ पौधो जीवों को पूजते आए है। ये सभी पारिस्थितिक तंत्र का हिस्सा हैं जिन पर हमारा जीवन भी निर्भर करता है। इन सभी की वजह से ही मानवता को भोजन, आवास व अन्य आवश्यक संसाधन मिलते है। इस प्राकृतिक परिवेश में एक भी जीव अगर लुप्त होता है, तो इसका विपरीत असर पूरे पारितन्त्र पर पड़ता है। हर प्रजाति हर  छोटे से बङे जीव की खास भूमिका है।

हम प्राकृतिक परिवेश मे रहते हुए भी, जानते समझते हुए भी, सारी गतिविधियाँ प्रकृति के खि़लाफ करते रहते हैं, जबकि प्राकृतिक तन्त्र ‘सन्तुलन’ के सिद्धान्त पर आधारित है। मनुष्य ने इसे काफि हद तक नष्ट कर दिया है। इसीलिए अगर हमें प्राकृतिक जैव विविधता को अविछिन्न रखना है, तो हमें प्रकृति का सहायक बनना ही पड़ेगा। उसके अलावा कोई दूसरा उपाय है भी नही।

  • पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 पर्यावरण को परिभाषित करता है “पर्यावरण में जल, वायु और भूमि में अंतर्संबंध शामिल हैं जो वायु, जल और भूमि और मानव प्राणियों, अन्य जीवित प्राणियों, पौधों, सूक्ष्म जीव और संपत्ति के बीच मौजूद हैं”।
  • अनुच्छेद 51-ए (जी) कहता है कि “यह भारत के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य होगा कि वे जंगलों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करें और जीवित प्राणियों के लिए दया करें।”

जल, जंगल और जमीन इन्हीं तीनों की प्रचुरता से समृद्धि बढ़ती है और भारत को ये तीनों चीजें प्रचुरता में हासिल है। लेकिन इनका संरक्षण रखना बहुत जरूरी है। प्रकृति की गोद में रह कर हम इससे खिलवाङ कैसे कर सकते है। बङे बूढे ने कहा है कि “प्रकृति से नही जीता जा सकता चाहे मनुष्य खुद को कितना बङा क्यों ना समझले”।

कुछ आवश्यक बिंदु

  • अधिक से अधिक पौधारोपण करें जिससे भू-क्षरण आदि से तो बचाव होगा ही, साथ ही सभी पक्षियों को बसेरा मिल सकेगा।
  • वनों की कटाई को रोककर निवास स्थान को संरक्षित किया जा सकता है। नए जंगल बनाने के लिए पेड़ (वनीकरण) का रोपण जो वन्यजीवों को आश्रय और भोजन प्रदान करता है, वन्यजीव अभयारण्य बनाकर जानवरों के प्राकृतिक आवास की रक्षा भी कर सकता है।
  • देशी पेङ पौधो की प्रजातियां वे पारिस्थितिक आधार हैं जिन पर जीवन निर्भर करता है, जिसमे पशु पक्षी और लोग भी शामिल हैं। देशी पौधे लगाएं क्योंकि वे स्थानीय पर्यावरणीय परिस्थितियों के अनुकूल विकसित होते है, उन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है, वे पर्यावरण में कार्बन सिंक है,  प्रदूषण को नियंत्रित करने और पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित करने में मदद करते है। 
  • पारम्परिक तरीके से होने वाली खेती की जगह औद्योगिक तरीके की खेती का प्रचलन बढ़ गया है। इसी के चलते हानिकारक कीटनाशक व खाद आदि का प्रयोग धड़ल्ले से हो रहा है। 
  • पर्यावरण में असन्तुलन बढ़ाने वाले कारकों, जैसे जनसंख्या वृद्धि, अन्धाधुन्ध औद्योगीकरण और रसायनों के अधिकाधिक प्रयोगों से हमें बचना होगा। 
  • जल प्रदूषण से जैव विविधता संकट में आ गई है। हमें पानी मे कूङा कर्कट व हानिकारक पदार्थ नही फेकने चाहिए।
  • कूड़े के निस्तारण के लिए कड़े इंतजाम किए जाएं।
  • भूजल पुनर्भरण-पुराने सूखे हुए कुओं व बावङियो को साफ करके पानी का रिचार्ज करे। नए तालाबो का निर्माण करके चारो ओर पेङ लगाकर बारिश के पानी का संचय करे। 
  • कम पानी उपयोग करने वाली फसले बोए जैसे बाजरा,तिलहन आदि।

हमें सकारात्मक सोच के साथ समाज की प्रगति मे योगदान देना चाहिए। जिन गतिविधियों से प्रकृति का नुकसान होता है, वह हमें कतई नही करनी चाहिए। हमें समझना होगा कि हम इस समय खुद क्या कर रहे है और आने वाली पीढी को क्या सीखा रहे है। 

*विश्व पर्यावरण दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं *

रुपक

Copyright ©2020,Rupak.All Rights reserved.
Rupak's avatar

By Rupak

Environment | Researcher | Renewable (Solar) | M.Tech | B.Tech | PGD in Environmental Law | Social work (Health, Environment, Women Empowerment, Education)| Nature Enthusiast| Wildlife Photography| Bird watcher| Blogger| Environmentalist
*Standing every day for dignity.
Believe in Humanity- Love & Compassion*

2 replies on “विश्व पर्यावरण दिवस- ” जैव विविधता “”

प्रसंसा योग्य 👌👍😊😊रूपक दीदी, आपके एसे विचारों से आप देश और लोगों मे एक नयी परिवर्तन क्रान्ति लाने मे समर्थ है|
👍👏👏👏👏👏

Liked by 1 person

Leave a reply to Manish kumar Cancel reply