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बचपन के दिन

Happy Children’s Day

ना कुछ पाने की आशा,

ना कुछ खोने का डर,

बस अपनी ही धुन,

बस अपने सपनो का घर,

ऐसे अनमोल होते हैं बचपन के पल

मुझे आज भी याद है कि कैसे काम में ना आने वाली चीजों से हम खिलौने बनाते थे, सभी टूटी चीजों को दूसरे काम के उपयोग में लाते थे। हम सभी दोस्तों की मण्डली हर घर जाकर किसी भी माँजी, चाची, ताई से कुछ मांगते थे तो वो अपने बच्चो की भाँति ही व्यवहार करती थी।

घर मे पड़ी टूटी चप्पलो से गाड़ी बनाना। कंचे खेलना, गिल्ली डंडे, पीठ्ठु, पतंग उड़ाना, पकडम पकड़ाई, आई स्पाइ, उचं-नीच का पापड़, पोषम पा, बर्फ-पानी खेलना, बारिश मे नहाना, कागज की नाव चलाना, कंकड़ पत्थर के गिट्टे, लटटू बनाना, गलियो मे क्रिकेट, पेपर या प्लास्टिक की बॉल बनाना, कॉमिक्स की किताबे पढ़ना, कैसेट सुनना, ट्रंप कार्ड्स, WWE, पोकेमोन कार्ड्स, सुपर मारियो वीडियो गेम, पेन, थंब फाइट, थ्रेड गेम, बबल गम टैटूज बनाना, एकड़ बकड़ बॉम्बे बो, तोता उड़ मैना उड़ खेलना, रस्सी कूदना, गोल्डा मारना, जमीन पे चाक से खाली खाने बनाके खेलना, कागज की हवाईजहाज़, पंखे, सांप सीढ़ी, मिट्टी के घर, पत्तियो से तरह तरह के आभूषण, खिलोने और कागज की पर्चियां बनाके चोर सिपाही खेलना। दिनभर ‘घर घर’ खेलना, गुडियो को सजाना, कोई रोकने टोकने वाला नही। और वो स्पीड से गाने का कंपिटिशन “खड़क सिंह के खड़कने से खड़कती है खिड़कियां; चंदू के चाचा ने, चंदू की चाची को, चांदनी चौक मे, चांदी की चमच से चटनी चटाई”। खो-खो, कबड्डी की धराचौकड़ी, कोई हार जीत का दुख नहीं।

टी वी मे दो चैनल आते थे, वो देखना और छत पे एंटीना को हिलाने जाना बार बार। शक्तिमान, चाचा चौधरी और साबू, रामायण, महाभारत, कृष्णा, आलिफ लैला, कार्टून, आँखो देखी इत्यादि देखना। तख्ती पे लिखना, पांचवी क्लास के बाद वो स्याही वाला पेन, पापा मम्मी का स्कूटर, गर्मी की छुटीयों मे नानी के घर जाना, सावन मे झूले डालना, पुराने टायर को लकड़ी से चलाना, कैंची मार साइकिल और दूर रिस्तेदार को चिट्ठीयां लिखने की बात ही कुछ और थी। खूब माखन, राबड़ी, बाजरे की खिचड़ी, गुड़ खाना। पूरी दोपहर मस्ती करना, आईसक्रीम, निंबू की शिकंजी, रसना, रॉफजा शरबत, गन्ने चूसना, मक्का, मूंगफली, बेर, आम, एक रू मे 50 टॉफिया, गुड़ की चिक्की, 1रु पेप्सी, कैम्पा कोला, बिग बबूल, बुढी के बाल, टोफिया (जैसे कॉफि बाइट, मैंगो बाइट, किसमी, मेलोडी, राजमलाई, कच्चा मैंगो), पिमपोम, पोलो, गुरु चेला, बर्फ के गोले इत्यादि के मजे लेना। Frooti, Parle-G तो अभी तक साथ है, और वो उंगलियो मे रंग बिरंगी कुकड़िया डालके खाना। माटी के घडो मे पानी पीना, माटी, अलुमिनियम के बर्तनों मे खाना बनाना। दूर दूर से पानी भरके लाना, बाद मे कुओ, हैंड पंप से पानी खीचना। एक रू मे पांच पानीपुरी, 2रू मे एक समोसा भी महंगा लगना। हिंगोली, तारे, सितारे, पॉपकॉर्न के लिए दुकानों के चक्कर लगाना, ढेर सारी बातें दोस्तो से करना।खेतों से साग, सब्जियां तोड़कर लाना। सांस्कृतिक कार्यकर्मो, सर्कस, जादुई खेल, मेलो मे मौज करना, चाबी वाली खिलौने, छोटी प्लास्टिक की कार, मिनी किचन सेट, आवाज वाली पिस्तोल, पपीया, बांसुरी, लकड़ी के खिलौने लाना। गुल्लक मे पैसे जोड़ना, पुराने स्पिकर्स से चुंबक निकालके नये वैज्ञानिक परीक्षण करना।

सारे मंदिरो मे जाना। बड़े बुढो की सेवा करना, उनके साथ बैठकर रेडियो पर रागनी सुनना, समाचार सुनना। दादी माँ की राजा, परियों कहानियाँ। मम्मी, बुआ, चाची, ताई, भाभियों के साथ स्वेटर बुन्ना, तरह तरह के पारम्परिक चीजें बनाना। सब एक साथ मिलकर खाने के लिए जवे (सेवाईया), नमकपारे, मिठी पूरी, शकरपारे इत्यादि बनाना। उस वक्त कोई टयुटर नहीं बल्कि दादा , चाचा ताऊ ही पढ़ाते थे। कॉपियो पर कागज के कवर चढ़ाना और एक परमानेंट जामेट्री बॉक्स उसमे पेंसिल, प्रकार, डि, पैमाना सब अनिवार्य था। सपिरोग्राफ से तरह तरह के पैटर्न बनाना, वो मल्टी कलर कॉम्बो पेन तो भूलना नही। सब मिलकर ग्रुप फोटो खींचवाना। घर मे एक टेलीफोन, सब पड़ोसियों के फोन आने पे भागके उन्हे बुलाके लाना। या लोग फोन बूथ का इस्तेमाल करते थे। नीम, बबूल की दातून करना, लाल दंत मंजन से दांत साफ करना, सुबह बाबा के साथ खेतों मे जाना, सैर करना। गीत, बाजे, भजन गाना बजाना। अगर नाराजगी हो तो कट्टी, अब्बा भी जल्दी ही कर लेते थे। शादी जैसे पारिवारिक कार्यकर्मो मे पूरे गाँव का सहयोग करना, सभी रिस्तेदारो का मिलना, जुलना। ना किसी से मन मुटाव, ना दिलो मे शिकायते, सबसे प्यार करना। क्या ही दिन थे वो बचपन के ❤

रुपक

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By Rupak

Environment | Researcher | Renewable (Solar) | M.Tech | B.Tech | PGD in Environmental Law | Social work (Health, Environment, Women Empowerment, Education)| Nature Enthusiast| Wildlife Photography| Bird watcher| Blogger| Environmentalist
*Standing every day for dignity.
Believe in Humanity- Love & Compassion*

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