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विविध धर्मों में जैव-विविधता_6

“एक नेक व अच्छा इंसान वही है, जो प्रकृति मे सभी छोटे-बड़े, अतिसुक्ष्म, निर्जीव-जीव प्राणियों का व वनस्पति जगत का आदर करता है और उनके संरक्षण को परम धर्म मानता हैं”- रुपक

मैं यह श्रृंखला “विविध धर्मों में जैव विविधता” पर क्यों लिख रही हूँ?

क्योंकि आज के समय में प्रकृति, पर्यावरण, वातावरण- परिवर्तन, जैव विविधता आदि विषयों को आधुनिक विज्ञान व आधुनिक खोजों का केंद्र समझा जा रहा हैं, बल्कि ये तो सदियों से ही हमारे धार्मिक ग्रंथो का हिस्सा रहे है। पहले हम ‘धर्म’ को मानवता, सेवा, ज्ञान की खोज, मानव जीवन का उद्देश्य, मोक्ष, शांति-प्राप्ति आदि के लिए देखते रहे है पर आज की जरूरत के हिसाब से मेरा विशेष मानना ​​है कि मानव और पर्यावरण के बीच संबंध के बारे में ‘जागरूकता’, हमारे अत्यंत सुंदर ग्रह ‘पृथ्वी’ के स्वास्थ्य और स्वयं हमारे अस्तित्व के लिए बहुत आवश्यक है।


जैन धर्म

“मनुष्य को सभी प्राणियों के साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए जैसा वह स्वयं करता है, स्वयं चाहता है”

जैन धर्म एक ऐसा धर्म है जो अहिंसा के लिए जाना जाता है। जैन मानते हैं कि धरती पर सभी जीवन पवित्र है।

अहिंसा हाथ जैन धर्म का एक सामान्य प्रतीक है। यह प्रतीक अहिंसा (अहिंसा) के जैन व्रत का प्रतिनिधित्व करता है। हथेली में पहिया धर्म का प्रतिनिधित्व करता है और पहिया के केंद्र में अहिंसा शब्द है।

हिंदुओं और बौद्धों की तरह, जैन भी पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म का यह चक्र व्यक्ति के कर्म से निर्धारित होता है। बुरे कर्म, प्रकृति मे जीवित चीजों को नुकसान पहुंचाने के कारण होते हैं। बुरे कर्म से बचने के लिए, जैनियों को अहिंसा का अभ्यास करना चाहिए। और अहिंसा के सिद्धांत में मनुष्यों, पौधों, जानवरों और प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचाना शामिल है।

आत्मसंयम

एक महत्वपूर्ण जैन सिद्धांत है। जैन महावीर (जैनियों के 24वें और अंतिम तीर्थंकर) ने आचारंग सूत्र (प्रथम जैन अंग सूत्र) में स्पष्ट चेतावनी दी है कि प्रकृति के उपहारों/साधनों को बर्बाद नहीं करना और जहां तक ​​संभव हो अपनी जरूरतों को कम करना है। जैन धर्म में अपरिग्रह भी इस बात का सन्देश देते हैं कि ज्यादा संग्रह की प्रवृत्ति से पर्यावरण को नुकसान होता है।

जैन आगम प्रकृति को बहुत ही अनोखे तरीके से चित्रित करते हैं क्योंकि यह कहता है कि प्रकृति के पांच मुख्य तत्व; पृथ्वी (भूमि, मिट्टी, पत्थर, आदि), जल (बादल सहित जल संसाधन), अग्नि (अग्नि), वायु (वायु) और आकाश (आकाश) जीवित प्राणी हैं और उन्हें जीवित प्राणियों के रूप में माना जाना चाहिए।

पेड़ पौधों का संरक्षण

जैन धर्म दुनिया में सबसे अधिक पर्यावरण के प्रति जागरूक धर्मों में से एक है।

परस्पर निर्भरता

यह प्राचीन जैन सिद्धांत सिखाता है कि

सारी प्रकृति एक साथ बंधी हुई है, अगर कोई प्रकृति की परवाह नहीं करता है तो वह खुद परवाह भी नहीं करता है।

अय्यर सुत्तम

सबसे महत्वपूर्ण विहित जैन ग्रंथ में ये बताया गया है, पौधे और उसके हिस्सों को चोट लगने का बहुत ही संवेदनशील वर्णन है, जो इसे मानव शरीर और किसी हिस्से की चोट के समान है। पेड़-पौधे इंसानों की तरह ही दर्द का अनुभव करते हैं और महसूस करते हैं। 

भक्त जैन लोग आधुनिक एलोपैथिक दवाएं नहीं लेते हैं क्योंकि इसमें उनके शोध और निर्माण में अनेक हिंसाए शामिल है। जैन अनुयायी एक स्थापित परंपरा के रूप में, पौधे आधारित दवाओं पर निर्भर करते हैं।

इसलिए जैन लोगों और संगठनों के लिए आवश्यक है कि वे जैन सिद्धांतों के अनुसार औषधीय पौधों के यथा-स्थान (इन-सीटू) के साथ-साथ कृषि फार्मों में औषधीय पौधों का प्रचार, प्रसंस्करण और संग्रह करें

जीव-जानवरों का संरक्षण

जैन धर्म में अहिंसा शब्द पर्यावरण संरक्षण से ही जुड़ा है।

तत्वार्थ सूत्र

तत्वार्थ सूत्र के अनुसार जीवित चीजों की 8,400,000 प्रजातियां हैं – जिनमें से प्रत्येक जन्म, जीवन, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र का हिस्सा है। जैन धर्म में बैक्टीरिया से लेकर पौधों तक, जानवरों से लेकर इंसानों तक सभी के जीवन में एक आत्मा है। इसलिए सभी बहुत मूल्यवान है और अहिंसा का पालन करना आवश्यक माना गया है

सभी जैन मुनि मुँह पर मास्क लगाते हैं ताकि छोटे-से-छोटे जीव भी उनके साँस लेने या बोलने से नष्ट न हो जाएँ।

जैन मुनि या अनुयायी, जमीन के ऊपर उगने वाली सब्जियां खाते हैं, क्योंकि उनको पौधे को बरकरार रखते हुए भी तोड़ा जा सकता है। बरसाती मौसम के 4 महीनों के दौरान विशेष रूप से आलू, गाजर, अदरक आदि जैसी जड़ों को खाने से खुद को रोकते हैं। क्योंकी वे सोचते हैं कि इन सब्जियों के लिए मिट्टी खोदी जाती है और बारिश के मौसम में तो मिट्टी के जीव अधिक मारे जाते हैं।

“चौमासु/चतुर्मास” में, जीव (किसी भी प्रकार के जीवन) की अनजाने में हुई हत्या से बचने के लिए भिक्षु भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर नहीं घूमते हैं।

दयालु राजा मेघरथ (जिनकी आत्मा सोलहवें तीर्थंकर भगवान शांतिनाथ बनी) उनके बारे में एक प्रसिद्ध कहानी जैन धर्म की शिक्षाओं का उदाहरण है। उसका सार यही है कि

हर जीव प्राणी की रक्षा करना सभी का परम कर्तव्य है चाहे इसके लिए आपके अपने प्राण ही दांव पर क्यों न लगे

जैन धर्म मानता है कि हमारा जीवन (अस्तित्व और पोषण के लिए) पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर करता है।

इसलिए मनुष्य को पृथ्वी से जीविका प्राप्त करने की आवश्यकता है, ना कि क्षय/नुक्सान पहुँचाने की, समाप्त करने की, प्रदूषित करने, जलाने या नष्ट करने की।

केवल “पर्यावरणीय नैतिकता” जो संसाधनों के संरक्षण और बचाव के लिए समर्पित है, हमारे ग्रह पृथ्वी को बचा सकती है। इसलिए हर जैन अनुयायी को प्रकृति के संरक्षण के लिए प्रयासरत रहना चाहिए।

रुपक

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By Rupak

Environment | Researcher | Renewable (Solar) | M.Tech | B.Tech | PGD in Environmental Law | Social work (Health, Environment, Women Empowerment, Education)| Nature Enthusiast| Wildlife Photography| Bird watcher| Blogger| Environmentalist
*Standing every day for dignity.
Believe in Humanity- Love & Compassion*

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