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विविध धर्मों में जैव-विविधता_4

“एक नेक व अच्छा इंसान वही है, जो प्रकृति मे सभी छोटे-बड़े, अतिसुक्ष्म, निर्जीव-जीव प्राणियों का व वनस्पति जगत का आदर करता है और उनके संरक्षण को परम धर्म मानता हैं”- रुपक

सिख धर्म

सिख धर्मग्रंथ, श्री गुरु ग्रंथ साहिब, की सबसे पहली पंक्ति है – ‘कर्ता-पुरुख‘ जिसका अर्थ है कि ‘वाहेगुरु जी’, “इक ओंकार“- वाहेगुरु केवल एक है, वह संपूर्ण ब्रह्मांड के निर्माता हैं। इसलिए सिख धर्म मे प्रकृति और ‘पर्यावरण के अनुकूल वातावरण‘ को वाहेगुरु जी का दृश्य रूप माना गया हैं।

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सिख परंपरा का पारिस्थितिक आधार- जैसा कि गुरु ग्रंथ साहिब में वर्णित है, निर्माता (‘कादिर’) और निर्माण (‘कुदरत’) एक हैं। वाहेगुरु जी सभी चीज़ो मे व्याप्त है, और हमारे चारों ओर प्रकट सृष्टि में निहित है। हवा मे, जो जमीन और आसमान के बीच बहती है, नदियों और समुद्रों से बहने वाले पानी तक, जंगलों और खेतों में, जिन पर मनुष्य भोजन और आश्रय के लिए निर्भर है, साथ ही उन सभी भूमि और समुद्र मे रहने वाले प्राणियों मे, जो जीविका के लिए पृथ्वी पर निर्भर हैं।

जीवन की यह विविधता भूमि, जल और आकाश के माध्यम से निर्माता की रचनात्मक धारा की पुष्टि करती है। सृष्टि के सभी पहलू आपस में जुड़े हुए हैं, मनुष्य को पूरी सृष्टि का सम्मान करना चाहिए।

सिखों के लिए, पर्यावरण के बारे में मार्गदर्शक सिद्धांत है – इस दुनिया में सरलता, आनंद से रहना, वाहेगुरु द्वारा बनाई गई प्रकृति का सम्मान करना और सभी संसाधनों को समान रूप से साझा करके समानता की दिशा में काम करना।

गुरु नानक देवजी ने  “ब्रह्मांड के भीतर, पृथ्वी को एक मंदिर के रूप में बताया हैं।”  एक सतत, धारणीय, अधिक न्यायपूर्ण समाज संभव है, जहां जल, वायु, भूमि, जंगल और जैव-विविधता जीवंत है, और हमारी पीढ़ी और आने वाली पीढ़ी के लिए जीवित प्रणाली भी।

गुरबानी

गुरबानी- श्री गुरु ग्रंथ साहिब में निहित गुरु के शब्द

ਰਾਤੀ ਰੁਤੀ ਥਿਤੀ ਵਾਰ ॥ ਪਵਣ ਪਾਣੀ ਅਗਨੀ ਪਾਤਾਲ ॥

ਤਿਸੁ ਵਿਚਿ ਧਰਤੀ ਥਾਪਿ ਰਖੀ ਧਰਮ ਸਾਲ ॥  महला-१

अर्थात दिन/रात, चंद्र चक्र, सप्ताह के दिन; वायु, जल, अग्नि, निचले क्षेत्र; इन सबके बीच उन्होंने पृथ्वी को ‘धर्म’ के लिए या धर्म के घर के रूप मे स्थापित किया है। पृथ्वी पर, उन्होंने प्राणियों की विभिन्न प्रजातियों को रखा है जो अनगिनत और अंतहीन हैं। उनके कर्मों और उनके कार्यों से ही उनका न्याय किया जाएगा, उन्हे जाना जाएगा।

जानवरो का संरक्षण 

श्री गुरु ग्रंथ साहिब ,सिख गुरुओं के पवित्र लेखन के अलावा, वन्य जीवन और जैव-विविधता का एक समृद्ध दस्तावेज भी है।

सभी जीवित प्राणी वाहेगुरु का हिस्सा हैं, उनके और सभी मौजूदा जीवों के बीच प्राथमिक संबंध हैं:

ਜੋ ਅੰਤਰਿ ਸੋ ਬਾਹਰਿ ਦੇਖਹੁ ਅਵਰੁ ਨ ਦੂਜਾ ਕੋਈ ਜੀਉ ॥

ਗੁਰਮੁਖਿ ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਕਰਿ ਦੇਖਹੁ ਘਟਿ ਘਟਿ ਜੋਤਿ ਸਮੋਈ ਜੀਉ ॥

अर्थात अंदर जो भी है, उसे बाहर देखें, क्योंकि उसके बिना कोई दूसरा, दूसरा नहीं है। गुरु की कृपा से, हर एक को केवल एक आंख के साथ देखें, क्योंकि हर हृदय में दिव्य ज्योति समाहित है।

सृष्टि के साथ सद्भाव को प्रोत्साहित करना और अवांछित ‘मानव वर्चस्व’ को हतोत्साहित करना सिखाया गया है। सिख गुरुओं द्वारा प्रकृति के साथ सद्भाव में रहने का एक प्रतीक ‘गुरुद्वारों‘ के रूप से दिखाया गया है, जो बड़े तालाबों से घिरे है और जो समुद्री जीव विविधता का समर्थन करते है। 

सिख गुरुओं ने उपदेश दिया कि हमें ब्रह्मांड में किसी भी जीवित प्राणी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए, इसलिए सिख, शाकाहारी भोजन पसंद करते हैं, जो सभी गुरुद्वारों में परोसे जाने वाले गुरु का लंगर में निर्धारित है। 

सिख धर्म में, जंगली जानवरों, पक्षियों और पौधों सहित पृथ्वी की सभी जैव विविधता को परमात्मा का रचनात्मक खेल माना जाता है।

गुरुओं के रूपकों में/गुरुबानी मे, मोर, राजहंस, बाज, कोयल, कोकिला, सारस, हंस, उल्लू, कोयल जैसे पारंपरिक पक्षी, और बरगद, पीपल जैसे पेड़ों का प्रयोग किया जाता है।

सिख गुरुओं ने वनस्पतियों और जीवों के साथ-साथ ब्रह्मांड के जैविक और अजैविक तत्वों के लिए कई अनूठी कहानियों की व्याख्या की है। 

गुरु गोबिंद सिंह और ‘बाज’

“चिड़ियाँ नाल मैं बाज लड़ावाँ

गिदरां नुं मैं शेर बनावाँ

सवा लाख से एक लड़ावाँ

ताँ गोविंद सिंह नाम धरावाँ”

 सिखों द्वारा पहले प्रमुख वन्यजीव संरक्षण प्रयासों में से एक ‘बाज’ जो शौर्य पक्षी है, की सुरक्षा है, और जो गुरु गोबिंद सिंह से जुड़ी अपनी वीरता और ताकत के लिए जाना जाता है।

पेड़-पौधों का संरक्षण

शायद किसी अन्य धर्म ने वनस्पति को इतना महत्व नहीं दिया जितना सिख धर्म ने दिया है। सिख धर्म में पेड़ों को पवित्रता के रूप में जोड़ा गया है जैसे – बोहर, पिपली, नीम, जंड/जंडी/जाटी, गरना का पेड़, करीर, लुहुरा, शीशम, इमली, पहलाई, बेर का पेड़ इत्यादि। 

  • श्री हरमंदिर साहिब की बेरी- ‘दुख भंजनी बेरी’ 
  • सुल्तानपुर लोधी के ‘गुरुद्वारा बेर साहिब’ की बेरी
  • श्री हरमंदिर साहिब की बेरी – ‘बाबा बुद्ध की बेरी’
  • श्री हरमंदिर साहिब की बेरी- ‘लची बेर की बेरी’

पांच सदियों पहले, सिखों के सातवें गुरु, गुरु हर राय जी ने एक वन्यजीव अभयारण्य की स्थापना की थी और बहुत सारे फूलो की प्रजाति, औषधीय जड़ी-बूटियाँ और फल देने वाले पेड़ लगाए थे। सिख धर्म के अनुयायी परंपरागत रूप से गुरुद्वारों, तालाबों आदि के पास विविध वृक्षों की प्रजातियाँ लगाते रहे हैं। पवित्र स्थानों के पास लगाए गए पौधों व वृक्षों के समूह को “गुरु के बाग” या “गुरु का बगीचा” कहा जाता है।

गुरबानी

गुरबानी में प्रकृति का वर्णन है और उसके माध्यम से आध्यात्मिक संदेश प्राप्त होता है। जैसे-

ਸਗਲ ਬਨਸਪਤਿ ਮਹਿ ਬੈਸੰਤਰੁ ਸਗਲ ਦੂਧ ਮਹਿ ਘੀਆ ॥

ਊਚ ਨੀਚ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਸਮਾਣੀ ਘਟਿ ਘਟਿ ਮਾਧਉ ਜੀਆ ॥

जैसे सभी वनस्पतियों में आग और दूध में मक्खन निहित है, उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति, उच्च या निम्न, में दिव्य प्रकाश होता है, प्रत्येक जीव प्राणी के शरीर में प्रभु/गुरु व्याप्त होते हैं।

ਸਭੁ ਕੋ ਨਿਵੈ ਆਪ ਕਉ ਪਰ ਕਉ ਨਿਵੈ ਨ ਕੋਇ ॥ ਧਰਿ ਤਾਰਾਜੂ ਤੋਲੀਐ ਨਿਵੈ ਸੁ ਗਉਰਾ ਹੋਇ ॥

ਅਪਰਾਧੀ ਦੂਣਾ ਨਿਵੈ ਜੋ ਹੰਤਾ ਮਿਰਗਾਹਿ ॥ ਸੀਸਿ ਨਿਵਾਇਐ ਕਿਆ ਥੀਐ ਜਾ ਰਿਦੈ ਕੁਸੁਧੇ ਜਾਹਿ ॥

हर कोई अपने आगे तो झुकता है पर कोई दूसरे के आगे नही झुकता है। जब किसी चीज को तराजु पर रखा जाता है और तौला जाता है, तो जो नीचे उतरता है वही भारी होता है। जो पापी है वह तो मृग- शिकारी के समान दुगना झुक जाता है (जैसे शिकारी हिरण को मारने के लिए लेट जाता है) लेकिन जब मन अशुद्ध हो तो सिर झुकाकर क्या हासिल किया जा सकता है?

श्री गुरु ग्रंथ साहिब

‘वायु’ गुरु है, ‘जल’ पिता है,

और ‘पृथ्वी’ महान माता है। 

ਕਿਉ ਮੂਲੁ ਪਛਾਣੈ ਆਤਮੁ ਜਾਣੈ ਕਿਉ ਸਸਿ ਘਰਿ ਸੂਰੁ ਸਮਾਵੈ ॥

ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਉਮੈ ਵਿਚਹੁ ਖੋਵੈ ਤਉ ਨਾਨਕ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵੈ ॥

अर्थात कोई अपनी जड़ों को और स्वयं को कैसे जानता है, चन्द्रमा को सूर्य से प्रकाश कैसे मिलता है? गुरु उन्मुख बनो, अपना अहंकार छोड़ो और तुम्हें यह ज्ञान प्राप्त हो जाएगा। 

  • श्री गुरु ग्रंथ साहिब, सिखों को प्रकृति के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी करना सिखाते हैं और आने वाली पीढ़ियों की जरूरतों के साथ-साथ, अपनी वर्तमान जरूरतों को भी ध्यान में रखने को कहते हैं।
  • गुरु ग्रंथ साहिब का कहना है कि मानव जीवन का उद्देश्य अन्य लोगों, जानवरों और प्रकृति सहित अपने आसपास की हर चीज के साथ सामंजस्य बिठाना है।

गुरु नानक देव जी ने कहा है कि

मनुष्य प्रकृति की श्रेष्ठ रचना के रूप में हैं, तो उसे पृथ्वी की स्थिरता व संरक्षण, जानवरों की देखभाल और पेड़-पौधे लगाने के लिए आगे आना चाहिए।

किसी भी जानवर को मारना भी सख्त वर्जित बताया है। गुरु का ज्ञान ही सभी सिखों को जैव-विविधता संरक्षण के लिए मजबूत समर्थन प्रदान करता है।

रुपक

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By Rupak

Environment | Researcher | Renewable (Solar) | M.Tech | B.Tech | PGD in Environmental Law | Social work (Health, Environment, Women Empowerment, Education)| Nature Enthusiast| Wildlife Photography| Bird watcher| Blogger| Environmentalist
*Standing every day for dignity.
Believe in Humanity- Love & Compassion*

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