“एक नेक व अच्छा इंसान वही है, जो प्रकृति मे सभी छोटे-बड़े, अतिसुक्ष्म, निर्जीव-जीव प्राणियों का व वनस्पति जगत का आदर करता है और उनके संरक्षण को परम धर्म मानता हैं ” -रुपक
बौद्ध धर्म
बौद्ध धर्म की मूल शिक्षा प्रकृति एवं मनुष्य के बीच आत्मिक जुड़ाव की है।

बुद्ध के उपदेश
यह धर्म पांच उपदेशों (चार आर्य सत्य- दुःख, दुःख कारण, दुःख निरोध, दुःख निरोध का मार्ग) के पालन के माध्यम से, ‘आष्टांगिक मार्ग‘ (सम्यक् दृष्टि, सम्यक् संकल्प, सम्यक् वचन, सम्यक् कर्म, सम्यक् आजीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति और सम्यक् समाधि) की खोज और कर्म की समझ के माध्यम से ज्ञान की खोज करता है। बौद्ध, जीवन के सभी रूपों की एकात्मता/परस्पर निर्भरता को स्वीकार करते हुए, स्वयं को प्रकृति के साथ सामंजस्य में पाते हैं।
बौद्ध धर्म का मार्गदर्शक सिद्धांत–
“सभी जीवन रूपों के साथ-साथ प्रकृति में संतुलन और शांति का सम्मान करने के लिए, सरलता से जीना है।”
बौद्ध धर्म ‘जैव विविधता की विलुप्तता‘ को दूर करने के लिए, ‘पारिस्थितिक जागरूकता‘ को प्रेरित करता है।
जंगल/पेड़ो का संरक्षण
इस धर्म में वृक्षों को काटना जघन्य अपराध है। भगवान बुद्ध को पीपल के पेड़ के नीचे ही बोधिसत्व प्राप्त हुआ था।
बौद्ध साहित्यों में बहुत सारे जंगल/पेड़ो को भगवान गौतम बुद्ध से जुड़े हुए बताया गया हैं जैसे पीपल, अशोक वृक्ष, बरगद का पेड़, जामुन का पेड़, लुंबिनी व अंबपाली वन इत्यादि।
- पीपल का पेड़– बौद्ध धर्म में इसे बोधी ट्री के नाम से जानते हैं। इसी पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। यह पेड़ सबसे ज्यादा ऑक्सीजन देता है। इस धर्म में पीपल का पेड़ लगाने के लिए कहा गया है।
- लुंबिनी वन– इस जंगल में अशोक के पेड़ के नीचे भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था।
- अम्बपाली वन– भगवान बुद्ध ने अपने महापरिनिर्वाण के लिए, कुशीनगर की यात्रा करने से पहले इसी जंगल में ही उनके जीवन का अंतिम वर्ष बिताया था।
- साल का वृक्ष- बौद्ध साहित्यो मे बताया गया है कि भगवान बुद्ध की मृत्यु दो साल के पेड़ों के बीच हुई थी।
- अशोक वृक्ष– अशोक वृक्ष को जन्म वृक्ष माना जाता है। अशोक वृक्ष की शाखाओ को उनकी माँ मायादेवी ने प्रसव के समय धारण किया था।
- बरगद– भगवान बुद्ध ने अपना पंद्रहवां बरसात का मौसम, निग्रोधरम (एक बरगद के जंगल में निर्मित मठ), कपिलवस्तु में बिताया।
चीन एवं जापान में बौद्ध मठों में ‘गिंक्लो बाइलोबा’ नामक वृक्ष उगाया जाता है।धार्मिक आस्था के कारण यह वृक्ष जीवित जीवाश्म के रूप में पूजा जाता है।
मठों और स्तूपों के पास जो बगीचों का निर्माण किया जाता है, वो भगवान बुद्ध के समय मे नालंदा और तक्षशिला के बगीचो/उद्यानों के विवरण से लिया गया है।
हिन्दू ,जैन एवं बौद्ध सन्यासी ध्यान लगाने के लिये प्राकृतिक एवं शान्त वातावरण का उपयोग करते थे। ये शान्त वातावरण जंगल में ही मिलता था।
जीव-जानवरों का संरक्षण
बुद्ध धर्म मे यह मानते हैं कि पर्यावरण संरक्षण में न केवल मनुष्य बल्कि इस संसार के सभी जीवों को भी ध्यान में रखना चाहिए क्योंकि ‘जीवित रहना’ इस पर निर्भर करता है।
“प्रकृति में सभी जीवन-रूप विशेष हैं, केवल मनुष्य ही नहीं “
बौद्ध सिद्धांतों के अनुसार जानवरों में “बुद्ध प्रकृति” होती है और इसलिए ‘प्रबुद्ध’ बनने की समान क्षमता होती है।
इसके अलावा, ‘पुनर्जन्म के सिद्धांत’ के अनुसार कोई भी इंसान का एक जानवर के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है, और किसी भी जानवर का मानव के रूप में पुनर्जन्म हो सकता है। वे सभी आपस में जुड़े हुए हैं।
जातक कथाएँ जो बुद्ध के पिछले जीवन के बारे में बताती हैं। उदाहरण के लिए एक कथा मे शाक्यमुनि ने एक बाज से कबूतर को बचाने के लिए खुद को बलिदान कर दिया था। अक्सर जानवरों को अमुख्य या मुख्य पात्रों के रूप में शामिल करती हैं। कहानियों में कभी तो जानवर अकेले ही होते हैं, या कभी-कभी मनुष्यों और जानवरों के बीच संघर्ष वाली कहानियों में शामिल होते हैं। कुछ कथाओं मे जानवर अक्सर दयालुता और उदारता की विशेषताओं का प्रदर्शन करते हैं जो मनुष्यों में अनुपस्थित हैं।
भगवान बुद्ध ने बौद्ध भिक्षुओं को बताया कि किसी अन्य प्राणी के स्थापित आवास को बाधित नहीं करना चाहिए और न ही अन्य जीव प्राणियों को मारना चाहिए। यह “अहिंसा” की अवधारणा से संबंधित है और “नुकसान न पहुँचाए” के विचार पर आधारित है।
जानवरों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट करके हम कुछ ऐसा छीन रहे है जो हमारा है ही नहीं। अतः बौद्ध, सोच-समझकर कार्य करके पर्यावरण को विनाश और शोषण से बचा सकते हैं।
बौद्धों को सभी प्राणियों के प्रति करुणा दिखाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
अंतर-धार्मिक बैठक – असीसी (इटली)
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंटरनेशनल (WWF International) द्वारा 1986 में असीसी (इटली) में प्रकृति संरक्षण पर पहली अंतर-धार्मिक बैठक आयोजित की गई जिसमें वन्य जीवन और पर्यावरण का सम्मान करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। उसमे बताया गया था कि अतीत में, लोग मनुष्यों और प्रकृति के बीच सामंजस्य की आवश्यकता के बारे में जानते थे, पूजा करते थे, मानते थे कि नदियों, पहाड़ों, झीलों और पेड़ों में कई आत्माएं और शक्तियां निष्क्रिय थीं। अगर इन प्राकृतिक तत्वों में से किसी को भी कोई भी नुकसान किया गया तो यह सूखा पड़ने के प्रकोप,महामारी, मनुष्यों में बीमारी और मिट्टी की उर्वरता को भारी नुकसान पहुँचाएगा।
अधिकांश बौद्ध मानते हैं कि
दुनिया के लिए मुख्य खतरा यह रहा है कि मनुष्य अपने कार्यों से, अन्यप्राणियों पर, पड़ने वाले प्रभाव के प्रति उदासीन रहा है। जब यह उदासीनता समाप्त हो जाती है, और हम जागरूक और दयालु हो जाते हैं, तभी यह दुनिया शांति, सद्भाव और संतुलन की ओर लौटेगी।
कुछ बौद्ध हर चीज के ‘अंतर-संबंधितता’ के विचार की शिक्षा देते हैं। इसका मतलब है कि मनुष्य प्रकृति पर निर्भर है और प्रकृति मनुष्य पर। इसलिए अगर लोग, पूरी दुनिया के साथ सरलता और सद्भाव में रहना सीख जाते हैं, तो पूरे पर्यावरण को फायदा होगा।
बौद्ध प्रकृति में परिवर्तन को स्वीकार करते हैं। “परिवर्तन” विकास का एक अनिवार्य हिस्सा है।

लोगों को सरलता से जीने और प्रकृति में चक्र और संतुलन का सम्मान करने की आवश्यकता है ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए सब कुछ जारी रह सके।
सभी धर्मों का मूल सिद्धान्त प्रकृति एवं मनुष्य के बीच समन्वय है। कोई भी धर्म प्रकृति के विरुद्ध चलकर अस्तित्व में नहीं रह सकता है। धर्म हमेशा से प्रकृति के संरक्षण में निहित हैं।
बौद्ध धर्म गुरु दलाई लामा-
“हम वह पीढ़ी हैं जो “बड़े खतरे” से अवगत हैं। हम ही हैं जिनकी जिम्मेदारी है और जिनमे ठोस कदम उठाने की क्षमता है, इससे पहले कि बहुत देर हो जाए।”
अर्थात बौद्धों को पर्यावरण को होने वाले नुकसान के बारे में खुद को जागरूक करना होगा ताकि वे इसे बदलने के लिए कार्य कर सकें।
रुपक
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