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विविध धर्मों में जैव-विविधता_2

“एक नेक व अच्छा इंसान वही है, जो प्रकृति मे सभी छोटे-बड़े, अतिसुक्ष्म, निर्जीव-जीव प्राणियों का व वनस्पति जगत का आदर करता है और उनके संरक्षण को परम धर्म मानता हैं ” -रुपक

इस्लाम  धर्म

इस्लाम जैव-विविधता को अल्लाह की बुद्धि और सर्वशक्तिमानता की अभिव्यक्ति और मानव विकास के समर्थन के रूप में देखता है।

pic- Internet

इस्लामी शिक्षाएं मानव जाति को जैव-विविधता का संरक्षण व अन्य सभी जैविक रचनाओं के साथ शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए कहती है।

कुरान के परिप्रेक्ष्य में, मनुष्य को सृष्टि के निर्माता की सेवा करने के लिए बनाया गया है जिसका वास्तव में अर्थ है स्वयं के लिए, समुदाय की भलाई के लिए और पर्यावरण का संरक्षण के लिए सेवा का भाव करना। यह परिप्रेक्ष्य इस्लामी ‘पर्यावरण नैतिकता’ की नींव का हिस्सा है।

जानवरों का संरक्षण

हक्कल मखलूफ” (जानवरों / पौधों आदि के अधिकार) इस्लामी सिद्धांत में “हक्कल-अल्लाह” (अल्लाह के अधिकार) और “हक़क़ल-इबाद” (मनुष्यों के अधिकार) के बाद, तीसरा सबसे महत्वपूर्ण दायित्व है। मनुष्यों के अलावा, अल्लाह के रचे हुए अन्य जीवों के संरक्षण और करुणा को “हक्कल मखलूफ” माना जाता है।

पुस्तक -अबू दाऊद

“जानवरों के साथ अपने व्यवहार में, अल्लाह से डरो”

अल्लाह जीवों को मानव जाति के समान जीवित समाज मानता है।

सूरह-अनाम (6:38)

“पृथ्वी पर न तो कोई पशु है और न ही दो पंखों से उड़ने वाला प्राणी, परन्तु वे सभी तुम्हारे समान हैं”

“जो कोई ख़ुदा के प्राणियों पर दया करता है, वह अपने आप पर दया करता है”

इस्लाम में पर्यावरण की सुरक्षा को बहुत महत्व दिया है। और पैगंबर ने अपने अनुयायियों से कहा है कि वे पेड़ न काटें, जीवों के प्रति दयालुता का भाव रखे, नदियों को प्रदूषित न करें या वातावरण को दूषित न करें

इस्लामी “फ़िक़ा, इज़िमा या क़ियास” का शायद ही कोई अध्याय है जो जानवरों और उनके आवास से संबंधित नहीं है।

पृथ्वी पर जैव-विविधता की रक्षा करना सभी मुसलमानों का प्रमुख कर्तव्य है।

इस्लाम में प्रकृति का उद्देश्य, मनुष्य के लिए, ”अल्लाह की खोज के लिए प्रकृति का अध्ययन करना और मानव जाति के लाभ के लिए प्रकृति का उपयोग करना” है। प्रकृति, मानव जाति की आध्यात्मिक और भौतिक आवश्यकताओं को पूरा करती है।

इस्लाम धर्म संसाधनों को बर्बाद करने और पर्यावरण को नष्ट करने से भी मना करता है।

कुरान (13:8)

“ख़ुदा ने इस ब्रह्मांड में सब कुछ उचित अनुपात में बनाया है”

कुरान मे कहा है किसी भी प्रजाति को उसके प्राकृतिक पुनर्जनन से अधिक दर से नहीं काटा जाना चाहिए।

पैगंबर मुहम्मद ने मुसलमानों को युद्ध के दौरान पेड़ नहीं काटने का आदेश दिया। उन्होंने पर्यावरण के संरक्षण और इसके विनाश की रोकथाम पर जोर दिया।

इस्लाम मे, मनुष्य द्वारा, किसी भी प्रजाति के जानवरों या पौधों के पूर्ण विनाश को उचित नहीं ठहराया जा सकता है।

पवित्र कुरान में प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने के लिए बार-बार उल्लेख किया गया है

बुखारी

“यदि कोई मुसलमान पेड़ लगाता है या बीज बोता है, और फिर कोई पक्षी, या कोई व्यक्ति या कोई जानवर उसे खाता है, तो यह उसके लिए एक दान (सदक़ा) माना जाता है”

पवित्र कुरान में बताया है कि पृथ्वी हरी भरी और सुंदर है। स्वर्ग और पृथ्वी और जो कुछ उनमें है, वह केवल अल्लाह का है। मनुष्य को तो इच्छित उद्देश्यों के अनुसार पृथ्वी का प्रबंधन करने के लिए नियुक्त किया है; इस प्रकार उसे रखरखाव और देखभाल का जिम्मा सौंपा गया है।

कुरान (44:38-39)

“अल्लाह ने इस ब्रह्मांड में ज्ञान, मूल्य और उद्देश्य के बिना व्यर्थ में कुछ भी नहीं बनाया है”

अल्लाह ने पूरी पृथ्वी को शुद्ध और स्वच्छ पूजा का स्थान बनाया है, कहा है कि पेड़-पौधे लगाए और लगन से उसकी तब तक देखभाल करे जब तक कि वह परिपक्व न हो जाए और फल न दे जाए।

पैगंबर मोहम्मद ने अपने अनुयायियों से कहा है कि पृथ्वी की देखभाल करने के लिए अल्लाह द्वारा उन्हे पुरस्कृत किया जाएगा।

कुरान (40: 57)

अल्लाह ने , कुरान में मुसलमानों को पर्यावरण का सम्मान करने के लिए कहा हैं-

“वास्तव में मनुष्य की रचना से महान आकाश/स्वर्ग और पृथ्वी की रचना है”

सभी धर्मों का मूल सिद्धान्त प्रकृति एवं मनुष्य के बीच समन्वय है। कोई भी धर्म प्रकृति के विरुद्ध चलकर अस्तित्व में नहीं रह सकता है।

इसलिए पर्यावरण की रक्षा करना व जैव-विविधता का संरक्षण करना हर मुसलमान का धर्म कर्तव्य है।

रुपक

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By Rupak

Environment | Researcher | Renewable (Solar) | M.Tech | B.Tech | PGD in Environmental Law | Social work (Health, Environment, Women Empowerment, Education)| Nature Enthusiast| Wildlife Photography| Bird watcher| Blogger| Environmentalist
*Standing every day for dignity.
Believe in Humanity- Love & Compassion*

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