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विविध धर्मों में जैव-विविधता

“एक नेक व अच्छा इंसान वही है, जो प्रकृति मे सभी छोटे-बड़े, अतिसुक्ष्म, निर्जीव-जीव प्राणियों का व वनस्पति जगत का आदर करता है और उनके संरक्षण को परम धर्म मानता हैं ” -रुपक

प्राचीन काल से ही हमारे धर्मग्रंथों में विभिन्न पेड़-पौधों, औषधीय पौधों, वनस्पतियों व वन्य प्राणियों का विशेष उल्लेख किया गया है। हमारे धर्म, संस्कृति, सभ्यता व रोजमर्रा की गतिविधियों मे उन्हें धार्मिक आस्थाओं से जोड़कर, मानव समाज के कल्याण व स्वस्थ वातावरण के निर्माण हेतु प्रमुख स्थान दिया गया है।

“विविध धर्मों में जैव-विविधता” लिखना क्यों जरुरी है ?

क्योंकि आज के समय में प्रकृति, पर्यावरण, वातावरण- परिवर्तन, जैव विविधता आदि विषयों को आधुनिक विज्ञान व आधुनिक खोजों का केंद्र समझा जा रहा हैं, बल्कि ये सभी तो सदियों से ही हमारे धार्मिक ग्रंथो का हिस्सा रहे है। पहले हम ‘धर्म’ को मानवता, सेवा, ज्ञान की खोज, मानव जीवन का उद्देश्य, मोक्ष, शांति-प्राप्ति आदि के लिए देखते रहे है पर आज की जरूरत है कि हम हमारे धार्मिक ग्रंथो से अन्य विषयो के बारे मे भी जाने। मेरा विशेष मानना ​​है कि मानव और पर्यावरण के बीच पवित्र संबंध के बारे में ‘जागरूकता’, हमारे अत्यंत सुंदर ग्रह ‘पृथ्वी’ के स्वास्थ्य और स्वयं हमारे अस्तित्व के लिए बहुत आवश्यक है। इसलिए मैंने विविध धर्मों का  जैव- विविधता से संबंध को आलेख करने की एक छोट्टी सी कोशिश की हैं। उम्मीद है आप सभी को अच्छी लगेगी। 


हिंदू धर्म ()

इस धर्म को “पर्यावरण के अनुकूल धर्म” कहा जाता है।  हिन्दू मान्यता के अनुसार मनुष्य का अस्तित्व ही प्रकृति से निर्मित है। प्रकृति में विद्यमान पंच महाभूतों यथा- पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश व वायु द्वारा ही जीव जगत की संरचना हुई है। 

गोस्वामी तुलसीदास, श्रीरामचरितमानस-

छिति जल पावक गगन समीरा। 

पंच रचित अति अधम सरीरा ॥

हमारे देश की संस्कृति प्रकृति को पूजने वाली रही है। प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में धार्मिक मान्यताओं की अहम भूमिका है।

“मैं प्रकृति में ‘सुंदरता’ की अपनी भावना के लिए और ‘धार्मिक महत्व’ के साथ प्रकृति की सुंदर अभिव्यक्ति का निवेश करने में उनकी दूरदर्शिता के लिए, अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा में अपना सिर झुकाता हूं” -महात्मा गांधी जी

“सृष्टि के कण कण में भगवान”

हिंदू धर्म परमात्मा की सर्वव्यापी संप्रभुता में विश्वास करता है। पेड़-पौधे, जन्तु, जीव निर्जीव आदि सभी मे देवताओं का वास माना गया है। नदी, कुआँ, तालाब, वन, पत्थर, पहाड़ की पूजा, आँवला नवमी को आँवले के वृक्ष की पूजा, वट सावित्रि को बरगद की पूजा, जन्माष्टमी,दशहरा पर शमी वृक्ष की पूजा व कैर, पीपल, बरगद की पूजा इत्यादि। हिन्दू धर्म के हर त्यौहार में किसी-न-किसी जन्तु या वनस्पति के संरक्षण का सन्देश है।

इस धर्म में देवताओं के अवतार ही जैव विविधता पर आधारित है। शिव जी हिमालय की सम्पूर्ण जैव विविधताओं के संरक्षक माने जाते हैं। गणेश देवता को शुभ कार्य के प्रारंभ मे हाथी के रूप मे, विष्णु का मत्स्य अवतार, कूर्म (कछुआ) अवतार, वराह( सुअर) अवतार, हनुमानजी का वानर रूप, जामवंत, जटायु आदि सभी अवतार जैव विविधता का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। नागपंचमी को सर्पों की पूजा, गणेश पूजन में हाथियों एवं चूहों का संरक्षण, दुर्गा पूजा में शेरों का संरक्षण का सन्देश मिलता है। रामचन्द्रजी ने 14 वर्ष वनवास करके सम्पूर्ण वनवासियों एवं वन सम्पदाओं को राक्षसों से सुरक्षित किया था। कृष्ण ने गोवर्धन की पूजा करवा कर गोकुलवासियों को सन्देश दिया था कि जैव विविधताओं के संरक्षण से ही उनकी सुरक्षा जुड़ी हुई है।

भगवान कृष्ण मोरपंख को अपने मस्तिष्क पर सुशोभित करते थे। गणेश जी का वाहन चूहा, विष्णु जी की सवारी गरुड़, शिव जी का वाहन नंदी , देवी दुर्गा का वाहन बाघ, देवी सरस्वती की सवारी हंस, वायु देवता का वाहन चिंकारा माना गया है। 

बाघ और शेर को शौर्य का, कबूतर को शांति का, मोर को संपन्नता व तिव्र गति से फलने फूलने का प्रतीक माना गया है।

त्यौहारो पर गायों को अनाज, बंदरों को चूरमा, पक्षियों को दाना, चीटियों को आटा, नवदुर्गा पर ज्वारों का रोपण, दीपावली पर गाँवों में वनदेवी की पूजा ये सभी मान्यताएँ एवं परम्पराएँ प्राणियों एवं वनस्पतियों की सुरक्षा का सन्देश देती हैं एवं जैव संरक्षण में महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।

जैव विविधता शब्द सन् 1992 से अस्तित्व में आया तथापि इस विषय का ज्ञान (जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी तन्त्र)हमारे ऋषि-मुनियों को प्राचीन काल से था तथा वेदों एवं पुराणों में इसके महत्व का सटीक वर्णन किया, जिससे प्रकृति के जीवित व अजीवित घटकों के बीच परस्पर संतुलन बना रहे और जीव जगत का कल्याण होता रहे। तभी तो पेड़-पौधों, जानवरों, पशु-पक्षियों, नदियों, तालाबों व पर्वतों की पूजा का हिन्दु धर्म ग्रंथों में विधान किया गया।

महाभारत

“ईश्वर सभी चीजों में है और सभी चीजें ईश्वर में हैं”। महाभारत संकेत देता है कि प्रकृति के मूल तत्व ब्रह्मांडीय अस्तित्व का निर्माण करते हैं । पौधों और जानवरों सहित सभी तत्वों में देवत्व विद्यमान है। इसी प्रकार सिंह व वनों के बारे में भी महाभारत में कहा गया है कि

सिंहैर्विहीनं हि वनं विनश्येत्।

सिंहा विनश्येते स्युर्ऋते वनेन् ।।

अर्थात् सिंह से सूना हो जाने पर वन नष्ट हो जाता है और वन के बिना सिंह भी नष्ट हो जाते हैं।

मनुस्मृति

यावत् भूमण्डलम् धन्त् समग्र वन काननम्।

तावत तिष्ठति मेदिन्यम् संतति पुत्र पौत्रिकी।।

अर्थात जब तक पृथ्वी पर वन्य जीवों से सम्पन्न वन हैं तब तक धरती मानव वंश का पोषण करती रहेगी।

वराह पुराण

“जो एक पीपल, एक नीम, एक बड़, दस फूलों के पौधे, दो अनार, दो संतरे और पांच आम के पेड़ लगाता है, वह नरक में नहीं जाता”

रामायण काल

महर्षि बाल्मीकि जी ने दंडकारण्य सौपान व अरिष्ट पर्वत में वन्य प्राणियो व वनों का उल्लेख किया है।

विभिन्न राशियों जैसे मेष, मकर, वृश्चिक में भी प्राणियों का स्वरूप मान्य किया गया है।

चरक संहिता 

वनों के विनाश को राज्य के विनाश के रूप में लिया जाता है, वनीकरण/पुनर्वनरोपण को राज्य के पुनर्निर्माण और उसके कल्याण को आगे बढ़ाने का एक कार्य।

श्रीमद भगवद गीता

श्री भगवद गीता के अनुसार धर्म- कर्तव्य है। भगवान श्री कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि खड़े हो जाओ और लड़ो क्योंकि क्षत्रिय का कर्तव्य अच्छाई या धार्मिकता के लिए लड़ना है। ईश्वर, जीव, प्रकृति, काल (शाश्वत समय) और कर्म (गतिविधि) सभी को भगवद गीता में समझाया गया है।

हमारे धार्मिक ग्रंथ मे मानव समुदाय को अपने अस्तित्व और आसपास की जैव विविधता के लिए पर्यावरण की रक्षा करना ही सिखाया गया है।

श्रीमद्भागवत के दशम स्कंध में वृक्षों की महिमा की है –

अहो एषां बरं जन्म सर्वप्राण्युपजीवनम्। सुजनस्येव येषां वै विमुखा यान्ति नाभिनः। पत्रप पुष्प फलच्छाया, मूला बल्कला दारूभिः। गंध निर्यासभस्मा स्थितो क्मैः कामान् वितन्वते।।

“इन्हीं का जीवन श्रेष्ठ है। इनके द्वारा सब प्राणियों को जीवन मिलता है। सज्जन पुरुष की भाँति ये याचक को कभी निराश नहीं करते। पत्ते, फूल, फल, छाया, जड़, छाल, लकडी, गंध, गोंद, राख, अंकुर और कोपलों से ये वृक्ष मनुष्यों की समस्त मनोकामना पूर्ण करते हैं।

जीवन की सफलता इसी में है कि हम अपने धन से, विवेक से, अपनी वाणी से तथा प्राणों से ऐसे कर्म करें जिससे दूसरों को कष्ट न हो”

जानवरों का संरक्षण

“किसी राष्ट्र की महानता और उसकी नैतिक प्रगति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उसके जानवरों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है” – महात्मा गांधी जी

हिंदू धर्म जानवरों के संरक्षण का समर्थन करता है, मानता है कि इसमें भी आत्माएं हैं, और शाकाहार को बढ़ावा देता है। हिंदू धर्म में “अहिंसा” की एक मजबूत परंपरा है। कामधेनु भरण-पोषण करने वाली गाय थी, जिसके वंशज पृथ्वी के सभी पशु हैं। “गो” शब्द बहुत महत्वपूर्ण था: गोपुर गाँव का प्रवेश द्वार था, गोत्र वह कुल/वंश था जिससे एक व्यक्ति संबंधित था, गोष्टी अच्छे लोगों की एक सभा थी, गोसर्ग और गोधुली भोर और शाम का प्रतिनिधित्व करते थे, जबकि गोपा और गोवाला अधिकारी थे।

चरक संहिता में जानवरों की रक्षा करना एक पवित्र कर्तव्य माना जाता है।

“पृथ्वी हमारी मां है”

प्राचीन हिंदू शास्त्रों का पूरा जोर इसी बात पर है कि मनुष्य अपने आप को प्राकृतिक परिवेश से अलग नहीं कर सकता। 

सदाबहार वनों /पेड़ों को शाश्वत जीवन का प्रतीक माना जाता था और उन्हें काट देना देवताओं के क्रोध को आमंत्रित करना था।

वनों को ‘‘प्रकृति के फेफडे” कहा गया है तथा पेड़-पौधों को ‘‘लिविंग ऑक्सीजन सिलेण्डर”। यही हमें शुद्ध वायु, शुद्ध जल, शुद्ध वातावरण, पशु- पक्षियों को आश्रय तथा हमारी सभी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।

वास्तव में, सभी धार्मिक ग्रंथों मे मनुष्य को प्रकृति का दोहन करने से मना किया गया है। उन्हें प्रकृति के साथ सद्भाव में रहना सिखाया जाता है।

सभी धर्मों का मूल सिद्धान्त प्रकृति एवं मनुष्य के बीच समन्वय है। कोई भी धर्म प्रकृति के विरुद्ध चलकर अस्तित्व में नहीं रह सकता है।

हम अपने उद्धार के लिए काम करते हैं, हमें सभी प्राणियों के कल्याण के लिए भी काम करना चाहिए।

#International Day for Biological Diversity (IDB)

रुपक

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By Rupak

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*Standing every day for dignity.
Believe in Humanity- Love & Compassion*

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