
प्रकृति का वातावरण बदल रहा है। बहुत से कारण रहे है- प्राकृतिक और मानव निर्मित। जैसे-प्रदूषण,प्लास्टिक का प्रयोग,जंगलों का नष्ट होना, वन और कृषि-भूमिक्षरण, जैव विविधता में कमी, संसाधन रिक्तीकरण (पानी, पेङ पौधे,खनिज, मिट्टी आदि), संगठित कचरा, मलजल उपचार के संचालन की कमी, प्रकृति के साथ खिलवाङ, जागरूकता की कमी इत्यादि। इस विषय पर शुरू से ही ध्यान देने की जरूरत रही है। क्योंकि प्रकृति: रक्षति रक्षित:। एक छोटी सी कहानी के माध्यम से मैं कुछ महतूवपूर्ण बिंदुओ पर प्रकाश डालना चाहूंगी। हम सब चिंटू मेंढक की तरह है। एक बार प्रयोगशाला मे दो मेढकों पर प्रयोग चल रहा था उनके नाम चिंटू व मिंटू थे। मिंटू मेढक को गर्म पानी के पतिले मे डाल दिया, वह ताप सहन नही कर सका और तुरंत मर गया। यह देखकर चिंटू मेंढक बहुत खुश हुआ और वह वैज्ञानिको द्वारा दिए गये कीङे मकौङे खाने मे मस्त रहा। लेकिन यह क्या…. चिंटू मेंढक को एक ठंडे पानी के पतिले मे डाला वह और खुश हो गया। फिर वैज्ञानिको ने ने बर्नर का लौह धीरे धीरे तेज करते चले गए। चिंटू को ताप का अहसाह हुआ ही नही और वह कूद कूदकर पानी मे खेलता रहा। कुछ समय पश्चात उसके आसपास का वातावरण बिल्कुल बदल गया लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।बिल्कुल इसी तरह हम सभी को भी पर्यावरण मे बदलाव का अहसास पूरी तरह नही हो रहा है। अगर हम आज नही संभले तो शायद कभी नही संभल पाएंगे।
जल- जल प्रकृति द्वारा मनुष्य को दिया गया एक अमूल्य उपहार है।यह पंचतत्वो मे से एक है। ऐसा कहा जाता है कि जल ही जीवन है। जल के बिना जीवन असंभव है। भारत जैसे बङे देश मे गंगा यमुना जैसी नदियां बहती है फिर भी बहुत सारी जगहों पर पानी के लिए मीलो चलना पङता है, बूंद बूंद पानी के लिए बहुत मारामारी है। क्या कारण है आइए जाने। भारत में पानी की कमी कई कारणों से है। वनों की कटाई, मिट्टी का कटाव और कमी, तेजी से बढ़ती हुई जनसंख्या व औद्योगीकरण में अनियंत्रित वृद्धि आदि। बढ़ती आबादी के साथ मीठे पानी की मांग बढ़ रही है, लेकिन जल आपूर्ति की घटती मात्रा लोगों की जरूरतों को पूरा करने में विफल रहती है। क्योंकि भूजल के अत्यधिक उपयोग (कृषि में सिंचाई के लिए, घरेलू उद्देशयों जैसे नहाने, कपङे धोने, पशु नहलाने, वाहन धोने इत्यादि के लिए) से संसाधन में भी गिरावट आई है। जोहङ ,कुए सब सूख गए है। जैविक और रासायनिक दोनों प्रदूषकों से जल स्रोत दूषित होते हैं। जल स्त्रोतो में ठोस कचरे व प्लास्टिक की बढ़ती मात्रा भी पानी को भारी प्रदूषित करती है । बाढ़ नियंत्रण और मानसून पानी की निकासी प्रणाली ठीक से नही होने से और पानी का संग्रहण न करने से हमें दिक्कतों का सामना करना पङ रहा है।
जल है तो जीवन है, जीवन है तो ये पर्यावरण है,
पर्यावरण से ये धरती है और इस धरती से हम सब है
भूजल पुनर्भरण (Groundwater recharge या deep percolation)
जल संरक्षण बहुत वर्षों से एक महत्वपूर्ण व ध्यान देने योग्य मुद्दा रहा है। केन्द्रीय भूमि जल बोर्ड ने जल का संचय करने और पुनर्भरण के लिए पहली परियोजना हरियाणा में 1976 में कार्यान्वित की। भूजल पुनर्भरण एक जलवैज्ञानिक तकनीकी प्रक्रिया है जिसमें बारिश के पानी को पृथ्वी की सतह से गहराई में ले जाया जाता है। वार्षिक पुनर्भरणीय संसाधन 432 अरब घन मीटर (बी.सी.एम.) आंका गया है। जल संचय करने से 160 अरब घन मीटर (बी.सी.एम.) अतिरिक्त जल उपयोग के लिए उपलब्ध होगा। (स्त्रोत:विकिपीडीया)
पुनर्भरण का कार्य प्रकृति समय लगाकर स्वंय कर लेती है किन्तु आज की जरूरत को ध्यान में रखते हुए अब इसे कृत्रिम रूप से करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है।
निम्नलिखित आवश्यक्ताएं इस प्रकार है–
- पानी की उपलब्धता को बढ़ाने के लिए।
- जल स्तर में गिरावट पर नियन्त्रण करने के लिए।
- भूमि जल की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए।
- भूमि जल भण्डारण में वृध्दि के लिए।
- भमि जल गुणवत्ता में सुधार के लिए।
- भूमि जल के प्रदूषण को कम करने के लिए।
- मृदा कटाव को कम करने के लिए।
उपाय–
- छत से प्राप्त वर्षा जल का भूमि जलाशयों में पुनर्भरण निम्नलिखित संचयनाओं द्वारा किया जा सकता है जैसे पुराने व बेकार पड़े कुए, बंद पड़े/चालू नलकूप (हैंड पम्प), पुनर्भरण पिट (गङ्ढा), पुनर्भरण खाई, पुनर्भरण शाफ्ट द्वारा आदि।
- भू-जल संवर्द्धन के लिए अन्य संरचनाएँ– बावङी बनाना,रिसन गड्ढा या सोखता गड्ढा बनाना,परकोलेशन टैंक का निर्माण,अधोभूमि अवरोधक, रोक बाँध,खेत पोखर,चैक बांध , परिरेखा बांध/कंटूर नाली (ट्रेन्च) का निर्माण आदि।
भूमिगत जल की विशेष्ताएं-
भूजल प्राय: सर्वत्र उपलब्ध होता है। यह रंगहीन व गंदलापन रहित है।कम स्वच्छ सतही जल की तुलना में भूजल स्वास्थ्य के लिए अधिक उपयोगी है। इसको तत्काल निकाला तथा उपयोग में लाया जा सकता है।यह कम खर्चीला व किफायती संसाधन है। भूजल आपूर्ति का दीर्घकालीन एवं विश्वसनीय स्रोत है। प्रदूषण का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम पड़ता है। खास बात यह भी है कि भूजल प्राय: बैक्टीरिया रहित होता है। तो आखिर हम खुद को क्यो न बदलेगें, क्यो न आज से अभी से हम जागरूक नागरिक बने व बूंद बूंद पानी बचाएं।
जल संरक्षण को अपनाना है,
आने वाले कल को पानी की कमी से बचाना है
कुछ आवश्यक बिंदु–
- अपने गावं मे जलाश्य आदि बनाकर उसके चारो ओर पेङ लगाए इससे मानसून का पानी एकत्र कर व भूजल में बढ़ोतरी ला सकते है। जल की कमी से लङ सकते है। शहरो मे रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम’ लगवाकर व अन्य वर्षा जल संचयन तकनीक प्रयोग मे लाकर हम जल की कमी से लङ सकते है।
- पुरानी सिंचाई तकनीकों पर रोक लगाएं और कृषि के लिए टपकन व फव्वारा सिंचाई आदि प्रणाली का उपयोग करे।
- फसल के पैटर्न में बदलाव- बदल बदल कर फसले बोए व कम पानी उपयोग करने वाली फसले बोए जैसे बाजरा, तिलहन आदि।
- साफ पानी को नालियो मे न बहने दे। टूंटी लगवाएं।
- शावर की बजाए बाल्टी मग का इस्तेमाल करे।
- फल सब्जी धोने वाले पानी को पौधो मे डाले।
- गाङी धोते समय पाईप की बजाय गीले कपङे का प्रयोग करे।
- प्लास्टिक व कूङा कर्कट आदि को पानी मे न फेंके।
- कारखानो से निकले अपशिष्टो व रसायनो का पानी मे विलय न होने दे और कारखानो मे साफ पीने का पानी प्रयोग मे लाने की जगह दूषित जल को फिल्टर कर आपूर्ति करे।
- स्मार्ट जल प्रौद्योगिकियो और तकनीको का इस्तेमाल करे।(*जो पानी या अपशिष्ट जल सेवाओं की डिलीवरी को बेहतर बनाने और इनके लिए उपयोग की जाने वाली परिसंपत्तियों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए वास्तविक या निकटवर्ती डेटा संग्रह, पारेषण और व्याख्या को कवर करता है।( स्त्रोत- स्मार्ट वाटर टेक्नोलॉजीज एंड टेक्निक्स: डेटा कैप्चर एंड एनालिसिस फॉर सस्टेनेबल वाटर मैनेजमेंट :डेविड एडन लोयड ओवन)
- जागरूकता बढ़ाएं ताकि हर नागरिक पानी के महत्व को समझे व पानी की बचत करे।
सरकार को निम्न बिंदुओ पर मिशन मोड मे काम करने की आवश्यक्ता है–
- हर समुदाय, कालोनी व बिल्डिगं मे ‘रेन वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम’ अनिवार्य करे।
- राष्ट्रिय स्तरीय मिशन प्रणाली में नदी, जलगृह क्षेत्र और आद्रभूमि का कायाकल्प किया जाना चाहिए ।
- स्थानीय ग्राहक सेवाएँ बनाएँ।
- ‘वाटर ऐप’ बनाकर समस्याए जाने, समाधान व सुझाव दे।
- ‘पानी का टैरिफ’ – प्रति माह एक निश्चित मात्रा में पानी की खपत के लिए मूल्य निर्धारित करे।
- उचित ‘जल निकासी प्रणाली’ की व्यवस्था सुनिचित करे।
- कूड़े को पानी मे विलय न होने दे व इसके निस्तारण के लिए भी कड़े इंतजाम किए जाएं।
- अंतर राज्य व क्षेत्रिय ‘जल आंवटन वाटर ग्रिड’ स्थापित करे।
प्रकृति ने मनुष्य को अपनी व बाकी प्राणियों की मदद हेतू काबिल बनाया उसे जिम्मेदार समझा। परंतु हम कही न कही विफल हो गए है। हर दिन पेङो की कटाई, तस्करी, दुर्लभ प्रजातियो का शिकार, जंगल मे आग लगना, वन्यजीव प्रजातियों व वनस्पतियों के लुप्त होने से मनुष्य पर भी खतरा मंडरा रहा है। मनुष्य ने अपने तुच्छ स्वार्थ पूरे करने के लिए प्रकृति को हल्के मे लिया हुआ है। मै सभी को कहना चाहती हूं कि इस पीढी को और आने वाली पीढी को हम क्या दे रहे है और क्या दे सकेंगे इस पर जरूर सोचिए। मै समझती हूं कि एक आदमी भी बहुत बङा बदलाव ला सकता है। जो लोग पानी बचाते है, वही लोग किसी के जीवन को बचाते है। हमने आज तक सिर्फ निजी जिम्मेदारियो पर ध्यान दिया पर हमे सामाजिक जिम्मेदारियो को भी निभाने की जरूरत है।
भारतीय नागरिको के मूल कर्तव्यों मे एक कर्तव्य यह भी है कि-
“To protect and improve the natural environment including forests, lakes, rivers, wildlife and to have compassion for living creatures”
यानि “प्राकृतिक पर्यावरण जिसके अंतर्गत वन, झील,नदी वन्य प्राणी आदि आते हैं की रक्षा व संवर्धन करें तथा प्राणी मात्र के प्रति दयाभाव रखें।”
इजराइल जैसे देश मे जहां वर्षा बहुत कम होती है पर वहां के लोगो को पानी की कमी नही रहती। हमे ऐसे देशो से सिखना चाहिए। पानी की आपूर्ति की बजाए पानी की खपत पर ध्यान देने की जरूरत है। पानी की महत्वता को समझते हुए भारत सरकार ने ‘जल शक्ति मंत्रालय’ बनाया है। उस पर निरंतर काम हो रहा है। पर भारतीय नागरिक होने के नाते हमारी भी कुछ नैतिक जिम्मेदारियां है। आप सब भी मेरी तरह पर्यावरण मित्र बन सकते है। तो आइए हम सब मिलकर देश की प्रगति में भागीदार बने।
आओ मिलकर पेङ लगाए,
जीवन जीने हेतु जल बचाए,
देश को आगे ले जाए,
पर्यावरण को स्वच्छ बनाए

रुपक
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