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बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ

बेटी बचाओ बेटी पढाओ, बेटो को सीखाओ और आप भी सीखो

एक लङकी के कठोर एवम् अनमोल शब्द-                                                                     "इसलिए सीखने की जरूरत हमें नही, बेटो को है, आप सबको है"

तोङ चली मैं सारे बंधन खुद की पहचान बनाने को,
इंसान हूं, इंसान ही रहने दो,
मत चाबी वाला खिलौना बनाओ।
मत बांधो इन 'प्रारूपों'और 'मानकों' में मुझे,
समझ लो,समझ लो सभी...
मत बांधो इन 'प्रारूपों' और 'मानकों' मे मुझे,
मेरी कल्पना मे है शक्ति, दूरदर्शी है सोच,
और ताकत है मुझमें 'समाज' बदलने की।
इसलिए सीखने की जरूरत हमें नही, बेटो को है,आप सबको है।।

अगर मैं मुस्कुराऊंगी, तो मेरी मुस्कान से सबके दिल खिलेगें, 
अगर मैं टूटी तो आप सब भी हार जाएगें।
इतनी समझदार हूं मैं, कि अपना और अपनों का अच्छा बुरा सब जानती हूं,
मत परेशान हो मेरे लिए कि 'कमजोर हूं अकेले क्या ही कर लूगीं'
मैं कहती हूँ मत परेशान हो...
वैसे भी आप सबके बोलने से मेरा फायदा, कभी होता तो नही।
नही चाहिए किसी का अहसान और 'मदद'
अपने हिस्से की लङाई मैने लङी है, 
आगे भी मुझे ही लङनी है 
और जीतनी भी है, विश्वास है जीतूगीं भी।
पर...इन घिन्न भरी आखों से मुझे जज करना बंद करो।
हर वो काम जो एक लङका करे तो सही,और मैं करू तो गलत
कहा का न्याय है ये?
इसलिए सीखने की जरूरत हमें नही, बेटो को है, आप सबको है।।

बचपन से लेकर बङे होने तक,
शादी से लेकर बुढ़ापे तक
हमेशा एक आदमी के पीछे बांधकर देखा गया क्यो?
कभी इनकी...बेटी तो कभी, उनकी...बहन
कभी इसकी...बहू, उसकी...बीवी।
क्यो जी, मेरी अपनी कोई पहचान नही है क्या,
मेरा अपना नाम नही है क्या?
ओह ओह समझी, समझी मैं...
अगर कोई बेटी, बहू बढ़ेगी आगे, 
तो फिर इस समाज में,'पुरूष प्रधानता' का झंडा कैसे लहरायेगा 
वो हुकूम किस पर चलाएगा
सारे दिन भर का चिङचिङापन उङेलकर
फिर खुद को 'मर्द' कैसे बताएगा।
अगर सीखाना ही है तो बेटो को सम्मान करना सीखाओ।
इसलिए सीखने की जरूरत हमें नही, बेटो को है, आप सबको है।।

सारी प्रथाएं, सारे रीति-रिवाज
आखिर हमारे सिर क्यो पङे,
हमने कभी नही कहा, हमें ये चाहिए,
बिल्कुल नही...
पर हमारे मन की बूझी ही कब जाती है।
हमें तो थमा दिया जाता है, वो'
आदर्श अच्छी लङकी' बनने की जिम्मेदारी
और सबकी 'इज्जत' हमारे सिर...लो निभाओ जिंदगी भर।
"ज्यादा उङो मत, हद में रहो"
"लगता है 'छूट' ज्यादा दे रखी है"
"इसकी शादी करो पीछा छुङाओ"
"सर पर पल्लू, मुहं पर घूघंट रखा कर, तेरी मां ने कुछ सिखाया नही क्या, 
"लोग क्या कहेंगे"
"कितनी बेहया है,आखिर हमे भी समाज मे रहना है"
अरे! कभी तो खुलकर जी लेने दो,
आखिर मैं भी इंसान हूं।
इसलिए सीखने की जरूरत हमें नही, बेटो को है, आप सबको है।।

कहते है कुछ लोग
"है वो कोमल और कमजोर, पाक-साफ है,
नही है समझ उसे बाहर की दुनिया की,
आखिर लङकी ठहरी, सुरक्षा की जिम्मेदारी है मर्द तुम्हारी"
पर कभी ये क्यो नही बताते, रक्षा करनी है किससे ?
मैं कोई चीज नही, जिसको छुपाया जाए, दबाया जाए,
मेरा अपना दिमाग है,
दिन भर के हजारो फैसले ऐसे ही नही ले लेती मैं, 
वो अलग बात है श्रेय कभी मिलता नही।
एक खुबसूरत मन है, सपने है।
समझ लो, जान लो ...
मैं ना कभी कमजोर थी, ना कभी हो सकती हूं।
अरे! सुरक्षा करनी ही है तो,
लाना नन्ही सी कली को दुनिया में, 
करना सुरक्षा उस बच्ची के सपनो की,
खूब पढाना लिखाना,
कुछ मत होने देना उसकी प्रतिष्ठा को,
बना के रखना उसका मान अपने घर भी,
कुछ करना ही है तो देना उसका साथ,
थोङा बहुत मुस्कुरा भी लेना,
चंद पल खुशी के समेट तुम लेना
इसलिए सीखने की जरूरत हमें नही, बेटो को है, आप सबको है।।

जब से दुनिया में आई हूं,
सब मुझे (लङकी) सीखाते ही रहते है,
सीखाते ही रहते है, क्यों?
बहुत हो गया अब और नहीं...
किस चीज का भय है दिलों में
कि समाज की कमान ना संभालने लग जाए,
या परिवार की मुखिया ना बन जाए।
क्यों, क्यों नही 'नेतृत्व' करते हुए देखना चाहते आखिर?
या इस बात का कष्ट है,अगर मुख्य भूमिका मे आए तो,
मर्द को दर्द ना हो जाएं।
एक बच्ची को दुनिया में लाकर तो देखो,
उसे उसका हक देकर तो देखो,
बेटी को उङान भरना सिखाकर तो देखो,
उसके सपनो को अपना बनाकर तो देखो,
उसे थोङा समझकर तो देखो,
उसके साथ थोङा जीकर तो देखो,
एक कोशिश करके तो देखो

.. क्योकि
सीखने की जरूरत हमें नही बल्कि---
●हर उस शख्स को है जो समझता है कि लङकियां उनसे बेहतर नही कर सकती,
 समझते है कि कंधा चाहिए होता है पर मै और आप जानते है असलियत क्या है।
●हर उस औरत को है जो खुद पूरी जिंदगी जिन बेङियों मे जकङी रही उसी मे अपनी बहू व बेटी को देखना चाहती है।
●उन मां बाप को है जो बेटी-बेटे मे भेदभाव करते है। बेटी को चूल्हा चोका और निर्भर होना व बेटे को प्रमुख, प्रधान और हावी होना सिखाते है।
●हर उस सास-ससुर को है जिनकी मानसिकता इतनी छोटी है कि बहू को बेटे के बराबर समझना मतलब सम्मान के विरुद्ध जाना।
●समाज के हर उस इंसान को है जो ये समझता है कि 'आदमी की जीत मे ही औरत की जीत है'। बेबुनियाद सोच है।

+बङे बुजुर्ग कहते है कि बेटियां उनको नसीब होती है जिनके सौ भाग्य अच्छे होते है।
+अजीब सी बात है ना जिस समाज मे लोग देवियो के आगे सिर झुकाते है वो बेटियो को किसी से कमतर कैसे समझ लेते है?
इसलिए सीखने की जरूरत हमें नही, बेटो को है, आप सबको है, आप सबको है।
#बेटी बचाओ बेटी पढाओ, बेटो को सीखाओ और आप भी सीखो
धन्यवाद।
                                                               -रुपक

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By Rupak

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